क़िस्त ==सात
डाक्टर रायजादा गाँव की ओर चल दिए,अमर
भी साथ था.रास्ते मैं एक जगह अमर को एक बांसुरी बेचने वाला दिखाई दिया तो उसने अचानक पुकार लिया फिर
शरमा गया. डॉ साहब ने उसके लिए बांसुरी खरीद दी अमर बांसुरी बजाने लगा .डॉ और अचला
चकित थे.रायजादा की बहन का विवाह धूमधाम से हुआ. डॉ साहब ने कहा—‘ अमर, जल्दी ही
हम यात्रा पर चलेंगे .वह किस यात्रा की बात कर रहे थे.!
डाक्टर रायजादा की नजरें अमर
पर गड़ी थीं। उन्हें अमर सब कुछ बता चुका था। थोडा-थोड़ा वह और
अचला भी पूछते रहे थे। वह जानते थे कि इस समय अमर के मन में कैसे विचार आ रहे
हैं अमर को उसी तरह बैठा छोड़कर वह दूसरे कमरे में दवाई लेने चले गए। जब
दवा लेकर लौटे तब भी अमर उसी तरह बैठा हुआ था-सिर झुकाए जमीन की ओर देखता
हुआ।
डाक्टर रायजादा ने धीरे से अमर के कन्धे
पर हाथ रख दिया। प्यार भरी आवाज में बोले-“अमर, इस तरह उदास क्यों हो। लो,
दवा खा लो।”
अमर ने चौंककर डाक्टर की तरफ देखा और
दवा ले ली। उसे डाक्टर और अचला
बहुत पसन्द थे। अचला तो बिल्कुल माँ की
तरह प्यार करती थी उसे।
“अब लेटकर आराम करो।” डाक्टर ने कहा और
दरवाजा बाहर से बन्द करते हुए नीचे चले गए।
अमर लेटा-लेटा खिड़की से हवेली के आँगन
में देखता रहा। इस समय वहाँ एकदम
सन्नाटा था। कल रात कितनी चहल-पहल थी।
कितनी रोशनी थी। उसके बाँसुरी बजाने
पर सबने कैसी शाबाशी दी थी। अमर
लेटा-लेटा मुसकराता रहा। उसे अच्छा लग रहा
था।
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हवेली के कमरों में जलने वाला प्रकाश बुझता
जा रहा था। सब सोने की तैयारी कर रहे थे।
तभी हवेली का दरवाजा खटखटाया जाने लगा।
कोई पुकार रहा था-“डाक्टर साहब। डाक्टर साहब।”
डाक्टर साहब के कमरे में रोशनी हुई।
अचला और डाक्टर साहब की आवाजें
सुनाई दीं, फिर डाक्टर साहब आँगन
में निकल आए। बाहरी दरवाजा खुला तो तीन
आदमी अन्दर चले आए।
“क्या बात है?“ डाक्टर रायजादा ने
पूछा।
एक आदमी जल्दी-जल्दी कुछ बताने लगा। अमर
ने कान लगाकर सुनना चाहा पर कुछ
समझ में नहीं आया। डाक्टर साहब ने आवाज
लगाई, “अचला, जरा मेरा बैग तो
देना। मैं मरीज देखने जा रहा हूँ।”
अचला बैग ले आई, बोली-“आधी रात हो चुकी है।
सुबह ये लोग मरीज को यहाँ लाकर दिखा सकते हैं। इस समय जाना ठीक नहीं है।”
अमर भी आँगन में आ पहुँचा। वह जानना
चाहता था कि आधी रात में डाक्टर साहब कहाँ जा रहे हैं?”
डा, रायजादा का बैग एक
आदमी ने पकड़ लिया। फिर उन्होंने अचला से कहा-“तुम जानती हो अगर रात में कोई बुलाने आता है तो मैं अवश्य जाता
हूँ। यह बात हमें समझनी चाहिए कि रोगी की तबीयत ज्यादा खराब होने पर ही लोग
रात में डाक्टर को बुलाने आते हैं।”
तभी उनकी नजर अमर पर पड़ी। बोले-“अरे, तुम अभी तक जाग रहे हो?
क्यों,
तबीयत तो ठीक है न?”
“जी,
ठीक है।”
अमर ने कहा।
“तो जाकर सो जाओ। मैं लौटकर तुम्हें एक
बात बताऊँगा।” और दरवाजे से बाहर
निकल गए। अचला भी उनके पीछे गई। वे
दोनों बाहर कुछ देर तक बात करते रहे।
अमर भी धीरे-धीरे वहाँ जा पहुँचा। बाहर
एकदम घुप्प अँधेरा था। आकाश में
चाँद भी नहीं था।
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डाक्टर साहब कार में बैठकर चल दिए। अमर कुछ
हैरान हुआ। कार का मतलब कहीं दूर जा रहे हैं। सामने अँधेरे में एक रोशनी
हिलती दिखाई दी। अमर की आँखों के सामने बरान गाँव का दृश्य तैर गया। वह
टीले पर पुराने मन्दिर के बाहर खड़ा है और रोहू अपनी दादी के साथ वापस जा रहा
है। फिर रोहू की चीख सुनाई देती है। उसे साँप ने काट लिया था। उस दिन भी दूर
से रोहू की दादी की लालटेन की रोशनी ऐसे ही हिल रही थी।
रोहू की याद आते ही अमर को जोर का
झटका लगा। वह सिहर उठा। शब्द होंठों
तक आकर रुक गए। न जाने कैसा होगा रोहू?
उसने अस्पताल में रोहू से मिलना चाहा था, पर बाँसुरी बाबा ने जाने नहीं दिया था। पता नहीं फिर क्या हुआ?
बाँसुरी बाबा का ध्यान आया, जो उसे पिता के पास
ले जा रहा था, लेकिन फिर कानों में
स्वर आया-‘अमर! अमर बेटा, कहाँ चला गया तू?’ और अमर की आँखें
आँसुओं से भर उठीं। उसने अपने को रोकने का प्रयास किया, पर आँसू थे कि बहे
चले आ रहे थे।
कन्धे पर किसी ने छुआ तो वह हड़बड़ा
गया। देखा अचला है। अमर का
हाथ थामकर वह अन्दर ले गई। अमर ने मौका
पाकर झट से आँसू पोंछ लिए। अगर
अँधेरा न होता तो....और फिर नींद आ गई।
अमर की नींद टूटी तो दिन का उजाला पसरने लगा था। उसने देखा अचला हवेली के बड़े दरवाजे
पर खड़ी थी। “तो क्या डाक्टर साहब नहीं लौटे?”
वह भागता हुआ अचला के पास जा खड़ा हुआ। तभी सामने से डाक्टर साहब की कार आती दिखार्द दी।
“आ गए।”
अचला ने कहा।
कार हवेली के दरवाजे पर आकर रुकी पर
उसमें से एक अजनबी बाहर निकला।
डाक्टर साहब नहीं आए थे। वह अजनबी अचला
से कुछ देर बातें करता रहा। दोनों
इतने धीमे स्वर में बोल रहे थे कि अमर
नहीं सुन पाया।
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उसने पूछा तो अचला ने कहा-“डाक्टर साहब की अपनी
तबीयत कुछ ठीक नहीं है। मुझे बुलाया है,’
“क्या हुआ?”
अचला के होंठों पर मुसकान आ गई। अमर का
हाथ थामकर बोली-“घबराने की कोई बात
नहीं है।”
अमर कुछ और पूछ पाता, इससे पहले ही अचला ने
कह दिया-“तुम्हें भी
मेरे साथ चलना है।”
अमर के मन में एक लहर-सी उठी। बोला-“मैं!”
“हाँ....झटपट तैयार हो जाओ, तब तक मैं भी.....” कहती हुई अचला अन्दर
चली गई।
कुछ देर बात दोनों कार में बैठ गए। सूनी
सड़क पर कार तेजी से दौड़ने लगी।
थोड़ा आगे घूमकर सड़क नदी के साथ-साथ
बनी हुई थी। सुबह के धुंधले उजाले में
वातावरण चुप था। हर पेड़-पौधा गीलेपन की
चादर से ढँका था। अमर खिड़की के
शीशे से बाहर देख रहा था। नदी के ऊपर
कुहरे की परत छाई थी। उसने नदी के पार
देखना चाहा, पर आँखें कुहरे की
चादर को भेद न सकीं। कार दौड़ी जा रही थी।
11.
उन्होंने बुलाया
झटके से अमर की नींद टूट गई। कार रुक गई थी। उसने बाहर देखा धूप
निकल आई थी। कार एक पेड़ के नीचे खड़ी थी। बहुत सारे बच्चे कार को घेरकर शोर
कर रहे थे। वह बाहर निकला, नजर घुमाकर देखा-- ऊँचा, घना वट वृक्ष।
डालियों से लटकती लम्बी पतली शाखाएँ-कुछ जमीन को छूती हुई। वह कुछ सोचता खड़ा
रहा। फिर सब याद आ गया।
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बरान गाँव....रोहू....हाँ, बाँसुरी बाबा के साथ
आकर पेड़ के नीचे इसी चबूतरे पर तो बैठा था वह। तो क्या फिर से
रोहू के गाँव आ पहुँचा है। अचला दिलचस्पी से अमर की ओर देख रही थी। दोनों की
नजरें मिलीं तो वह हँस पड़ी। बोली-“हैरान क्यों हो?”
‘बरान गाँव, रोहू....बरगद.....’ अमर जैसे अपने से बात
कर रहा था।
“हाँ,
बरान गाँव, तुम्हारे दोस्त रोहू
का घर। उससे मिलोगे नहीं?”
“रोहू.... कहाँ है वह कैसा है?”-अमर ने जल्दी से कहा
और इधर-उधर देखने लगा।
“आओ,
रोहू के पास चलें।” अचला ने कहा। तभी डाक्टर
साहब की आवाज कानों में पड़ी-“आ गए अमर।”
“डाक्टर साहब। आपकी तबीयत...”
“मैं बिल्कुल ठीक हूँ अमर.... जानते हो
डाक्टर कभी बीमार नहीं होता। अगर
वह बीमार हो जाएगा तो रोगी कैसे स्वस्थ
होंगे!” कहकर डाक्टर हँस पडे़।
डाक्टर साहब और अचला के साथ अमर बरान
गाँव की गली में बढ़ चला। हवा में
धुआं मँडरा रहा था। तभी एक दरवाजे पर
उसने रोहू की दादी को खड़े देखा। अमर
को देखकर वह भी आगे चली आई। उसे अपने से
लिपटा लिया। बालों में हाथ फेरती
हुई बोली-“आ गया।“
“हाँ,
अम्माँ,
रोहू कैसा है। ठीक तो है न!.... साँप ने
काटा था न उसे।”
“हाँ,
वह ठीक है। इधर कुछ दिनों से बीमार था, पर अब ठीक है। डाक्टर
साहब उसे दवा दे रहे हैं।”
डाक्टर साहब रोहू को दवा दे रहे हैं-अमर
ने अचरज से डाक्टर रायजादा की ओर देखा। वह धीरे-धीरे मुसकरा रहे थे। बोले-“पहले तुम्हें ठीक किया था,
अब रोहू की बारी है। वह एकदम ठीक है। आओ, अपने दोस्त से मिलो।” कहते हुए डा.
रायजादा उसे एक कोठरी में ले गए।
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दीवार से सटी चारपाई पर रोहू लेटा था।
“रोहू!”
अमर के होंठों से निकला और फिर दोनों ने
एक-दूसरे का हाथ थाम लिया। “कैसे हो रोहू?” अमर ने पूछा और फिर ध्यान आया-‘अरे, रोहू तो बोल ही
नहीं सकता। जवाब कैसे देगा।‘
रोहू ने अमर को अपने पास बैठा लिया। वह मुसकरा रहा था। उसकी उँगलियाँ अमर की हथेली पर रेखाएँ खींच
रही थीं-जैसे वह लिख रहा हो-‘मेरे दोस्त, मैं ठीक हूँ...तुम कैसे हो?
फिर एक आवाज उभरी-“अमर....अमर बेटा....” अमर किसी चाबी भरे
खिलौने की तरह घूम गया। सामने माँ खड़ी मुसकरा रही थी।
“माँ....”
अमर चीखा और जोर से रो पड़ा। छोटी-सी
कोठरी में उसके रोने की आवाज बिखरने लगी। रोहू अपलक उसे और कुसुम को ताक रहा था। कोठरी
में और कोई नहीं था।
सिसकियों के बीच अमर के थरथराते होंठों
से बस एक ही शब्द बार-बार निकल रहा था-“माँ....माँ....”
कुसुम झुककर बैठ गई और उसका आँसू-भीगा
चेहरा चूमने लगी। बीच-बीच में कह
रही थी-“मेरा बच्चा... मेरा बेटा.....मेरा बच्चा.... मुझे बिना बताए घर
से क्यों चला गया था। सोचा नहीं,
माँ का क्या होगा। वह जिन्दा कैसे
रहेगी....” कहती-कहती कुसुम जोर से रो पड़ी। वह अपने को रोक नहीं पा रही
थी.... और अब कोठरी में कुसुम की सिसकियाँ गूँज रही थीं। अमर उसे चुप कराने
लगा। उसके आँसू पोंछता जाता और कहता.....“माँ.... मेरी अच्छी माँ.... मैं कहीं नहीं जाऊँगा।” फिर पूछा बैठा.... “माँ, मेरे पीछे से पिताजी आए?”
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कुसुम की सिसकियाँ थम गईं। उसने कुछ कहा
नहीं.... वह एक हाथ से उसका सिर
सहला रही थी और दूसरे से उसे अपने से
जैसे चिपका लिया था। तभी डाक्टर साहब
अन्दर चले आए। बोले-“अमर.... मैं तुमसे
यही कहना चाहता था। असल में मैंने
तुम्हारी माँ और रोहू को अपने गाँव में
बुलाया था। मैं वहीं तुम्हें
मिलवाना चाहता था, पर पता चला कि रोहू
बीमार है, इसीलिए मैं रात को यहाँ
चला आया था। उसके बाद तो तुम जानते ही
हो।” अमर ने अचला की ओर देखा। वह मुसकरा रही थी। बोली-“अमर, मुझे पता था कि हम
कहाँ और किसलिए जा रहे हैं, पर डाक्टर साहब ने मना कर दिया था कि बरान गाँव पहुँचने से
पहले तुम्हें कुछ न बताऊँ।”
अमर ने शिकायत वाली नजरों से डाक्टर
रायजादा की ओर देखा तो वह बोले-“अमर बेटा, तुमने अपनी बीमारी के दौरान मुझे सब कुछ बता दिया था। मैं
बाँसुरीवाले बूढ़े के मरने के बाद तुम्हें अपने साथ ले गया था। फिर मैंने
सराय में जाकर पूछा तो धीरे-धीरे पूरी बात पता चली
थी- मैंने अस्पताल में
जाकर रोहू को भी देखा था।”
कोठरी में सब मौजूद थे, पर कोई कुछ नहीं बोल
रहा था। केवल डाक्टर रायजादा की आवाज गूँज
रही थी-“अमर, तुमने अपनी बेहोशी में बूंदपुर का नाम कई बार लिया था। मैं समझ गया कि तुम्हारा रहस्य जानने के लिए मुझे बूंदपुर जाना
होगा। तुम्हारा बूंदपुर छोटा-सा कस्बा है। वहाँ मुझे कई लोग जानते भी हैं।
वहाँ जाकर पता लगाना कठिन नहीं था। तुम्हारी माँ तुम्हारे चले जाने से कितनी दुखी थी, इसे भी लोग जानते थे।
मैं इनसे मिला। इन्हें पूरी बात बता दी। यह तो उसी समय आकर तुमसे मिलना
चाहती थीं, पर मैं जानता था,
पहले समस्या का हल खोज लूँ। मैं तुम्हें
तुरन्त बूंदपुर ले जा सकता था, पर कौन कह सकता था,
तुम पिता की खोज में फिर घर से नहीं चले
जाओगे।”
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फिर उन्होंने कुसुम की ओर इशारा
किया। कुसुम ने कहा-“हाँ, मैंने ही इनसे कहा था कि वह अगर फिर इसी तरह मुझे
छोड़कर चुपचाप पिता की खोज में निकल गया तो क्या होगा।” और आँचल से आँसू
पोंछने लगी। अमर ने माँ का हाथ थाम लिया। जैसे कह रहा हो-माँ, अब ऐसी गलती नहीं
होगी।
डाक्टर साहब ने कहा-“और तभी मुझे रोहू का ध्यान आया। मुझे तुमने बताया था कि रोहू को
साँप ने काटा था, इस बात से तुम कितने दुखी थे। मैंने बहुत सोचा और मुझे लगा, अगर रोहू तुम्हारे साथ रहने लगे तो बात बन जाएगी।”
“क्या रोहू मेरे साथ रहेगा?” अमर ने खुशी भरी आवाज
में कहा और रोहू का हाथ थाम लिया। रोहू
की समझ में शायद कुछ नहीं आया। वह अचरज
से इधर-उधर ताक रहा था।
डाक्टर साहब ने कहा-“अमर, रोहू के बहरेपन का
इलाज हो सकता है। मुझे पूरा
भरोसा है,
लेकिन यहाँ बरान गाँव में रहकर दवाई
नहीं हो सकती। मान लो अगर
यह तुम्हारे बूंदपुर वाले घर में
तुम्हारे साथ रहे तो कैसा रहे! मैं वहीं
आता-जाता रहूँगा।”
“तब तो मजा ही आ जाएगा।” अमर चहककर बोला।
“और कान ठीक होने के बाद यह तुम्हारे साथ
स्कूल भी जा सकेगा।” अचला ने कहा।
“और रोहू की दादी। यह गाँव....” अमर ने उलझन भरे स्वर
में कहा।
“अरे पगले,
रोहू क्या अपनी दादी के बिना रह सकता है? वह भी शहर जाएँगी।
जब
चाहो तुम और रोहू यहाँ भी आ सकोगे।”
“हम कब चलेंगे?” अमर ने पूछा।
“बेटा,
मैंने बैलगाड़ी वाले से कह दिया है। वह
आता ही होगा।” रोहू की दादी
बोली। अमर ने देखा कोठरी में कई
पोटलियाँ बँधी हुई रखी थीं। यानी यात्रा की
पूरी तैयारी थी।
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दिन ढल गया। बैलगाड़ी दरवाजे के सामने आ
लगी। रोहू के साथ दादी और कुसुम टप्पर के नीचे बिछे पुआल पर जा
बैठीं। अचला और डाक्टर रायजादा कार में बैठ गए। लेकिन अमर अभी बाहर खड़ा था
जैसे असमंजस में हो। अचला ने उसकी ओर देखा तो झिझकते हुए बोला-“मैं रोहू के साथ बैठ जाऊँ।”
“हाँ,
हाँ,
बैठ जाओ।”
अचला के इतना कहते ही वह उछलकर बैलगाड़ी में चढ़ गया। माँ की गोद में जा बैठा। तब तक अचला भी
कार से उतर आई। उसने डाक्टर रायजादा से कहा-“अगर मैं भी बैलगाड़ी
में यात्रा करूँ तो कैसा रहे? बचपन में बस एक बार बैठी थी।”
“तो मैं भी क्यों पीछे रहूँ।” डा. रायजादा
और अचला भी बैलगाड़ी में चढ़ गए। गाँव के बहुत से लोग रोहू और उसकी दादी को
विदा करने आए थे-औरतें, बच्चे, कई पुरुष। सब चुप खड़े
थे।
रोहू की दादी ने हाथ जोड़कर विदा ली।
बोली-“रोहू का इलाज करवाने जा रही हूँ। आशीर्वाद दो कि बच्चे के कान
ठीक हो जाएँ।”
“घबरा मत दादी, रोहू जरूर अच्छा हो
जाएगा।” गाँववालों ने सम्मिलित स्वर में कहा। चरमर-चूँ की
आवाज के साथ बैलगाड़ी बढ़ चली। अमर सोच रहा था-उस दिन भी तो ऐसे ही बैठे थे
बैलगाड़ी में। तब सब कितने चुप थे। रोहू को साँप ने काट लिया था। कुछ देर
बाद बैलगाड़ी पुराने मन्दिर वाले टीले के पास से होकर गुजरी। उस दिन का दृश्य
फिर आँखों में तैर गया- बाँसुरी बाबा के कहने पर वह कैसे डरता हुआ
अँधेरे में मन्दिर से पोटली लेने आया था और तभी रोहू की दादी लालटेन लेकर आ
गई थी। लेकिन आज तो सब तरफ उजाला था।
न जाने कब अमर के हाथों में
बाँसुरी आ गई। एक मीठी धुन हवा में बिखरने लगी। अमर को बाँसुरी बजाते देख
कुसुम की आँखें अचरज से फैल गईं। वह कुछ कहने को हुई तो डाक्टर रायजादा ने इशारे
से मना कर दिया। फुसफुसा कर बोले-“बस, सुनती
रहिए। सवाल बाद में.... मैं सब बता दूँगा।”
हिचकोले खाती बैलगाड़ी रास्ते पर
धीरे-धीरे बढ़ रही थी। अमर की बाँसुरी टेर रही थी। रोहू की उँगलियाँ अमर की
कलाई पर कस गईं जैसे अब दोनों कभी अलग नहीं होंगे। ( समाप्त )
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