क़िस्त – पांच
बांसुरी
बाबा और अमर को सराय में प्रवेश नहीं मिला. उनके पास पैसे जो नहीं थे. थोड़ी देर
बाद एक सेठ परिवार आया तो उनका खूब स्वागत हुआ.रात में सराय में लूट पाट करने आये
लोगों को बाबा ने ललकारा तो उन लोगों ने
बाबा को घायल कर दिया. हलचल मच गई. अब इन दोनों को अन्दर जगह मिल गई लेकिन बांसुरी
बाबा के घायल होने के बाद. सराय में नए मेहमान आये तो इन लोगों को कमरा खाली करना
पड़ा. अब जगह मिली मुख्य दरवाजे के पास जहां बारिश और हवा आ रही थी. बांसुरी बाबा
को तेज बुखार था (.अब पढ़ें क़िस्त – पांच )
तभी बाँसुरी बाबा ने फिर पुकारा-“छोकरे, बेटा।”
“हाँ,
बाबा।”
कहता हुआ अमर बूढ़े के निकट खिसक गया।
बूढ़े ने उसका हाथ पकड़ा तो अमर को बहुत
गरम लगा। बूढ़े को तेज बुखार था।
“क्या बात है बाबा।” जवाब में अमर के
कानों में रोने की आवाज आई। अरे!
बाँसुरी बाबा तो रो रहा था। न जाने क्या
बात थी! “बाबा, रोते क्यों हो,
क्या चाहिए?” उसने घबराए स्वर में
कहा।
“कुछ नहीं। मैं अब बचूंगा नहीं। लगता है
मौत अपने पास बुला रही है।”
“बाबा,
ऐसे मत कहो, मुझे डर लगता है।” अमर ने काँपते स्वर
में कहा।
“मैं तेरे से माफी माँगना चाहता हूँ। बोल, माफ कर देगा।” बाँसुरी बाबा बोला।
अमर चुप रहा।
बूढ़ा कह रहा था-“बेटा, मैंने तुझे बहुत परेशान
किया, न जाने कहाँ-कहाँ
भटकाया। तेरे से भीख मँगवाई। तूने कभी शिकायत
नहीं की। तूने मेरी हर बात
मानी,
पर मैं अच्छा आदमी नहीं हूँ। मैंने तेरे
से झूठ कहा था। मैं तेरे पिता से कभी नहीं मिला। मैंने उन्हें कभी नहीं देखा। मैं तुझे
तेरे पिता के पास नहीं ले जा सकता।”
“बाबा।”
अमर चीख उठा। उसका सिर चकरा उठा, बदन काँपने लगा जैसे सब कुछ गोल-गोल घूम रहा था। क्या बाबा सच
कह रहा है। वह सच में नहीं जानता कि मेरे पिता कहाँ हैं! उसे एकाएक
बहुत तेज गुस्सा आ गया। वह उठा और बाँसुरी बाबा की छाती पर मुक्के
बरसाने लगा “झूठा....झूठा......झूठा,
बोलो तुमने झूठ क्यों कहा।”
बाँसुरी बाबा ने उसके हाथ
नहीं रोके। उसके छोटे-छोटे मुक्कों की मार सहता रहा। फिर बोला-“बेटा, मैं ठहरा बूढ़ा आदमी।
अब ठीक से चला नहीं जाता। सोचा था तू
मेरे साथ होगा तो मुझे आराम रहेगा। रात को ठीक से दिखता भी नहीं,
इसलिए झूठ बोला था बेटा।
लेकिन अब झूठ नहीं बोलूँगा। तुझे सच बताकर ही चैन मिलेगा। मैंने तेरे
से झूठ बोला था।” और पीछे गिरकर हाँफने लगा।
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अमर उठकर आँगन की तरफ चला आया। बारिश की
तेजी पहले से कम जरूर हो गई थी, पर बूँदें अब भी गिर रही थीं। आँगन के दाएँ कोने से मेंढ़कों
की टर्र-टर्र सुनाई दी-अमर का मन हुआ कि अब यहाँ रहना ठीक नहीं.... तुरन्त
चल देना चाहिए....“मैं माँ के पास
जाऊँगा।
माँ...”
उसके
होठों
से निकला। वह बारिश में भीगता खड़ा रहा।
कुछ देर बाद पीछे लौटा तो देखा बूढ़ा
जमीन पर चुप लेटा था-एकदम खामोश। उसी
समय सराय के एक कमरे से कोई निकला और
दरवाजा खोलकर सराय से बाहर चला गया।
अमर की नजर दरवाजे से बाहर गई-घुप्प
अँधेरा। बस, दूर एक बत्ती चमक रही थी। उसने एक बार चुप पड़े
बाँसुरी बाबा की ओर देखा फिर दौड़कर सराय से बाहर निकला। अँधेरी सुनसान
सड़क पर भागने लगा। भागता चला गया। बारिश रुक चुकी थी। एक बादल के पीछे
से चाँद झाँक रहा था। अमर कींचड़ में छप-छप करता हुआ भागा जा रहा था। कहाँ, किधर यह उसे पता नहीं
था।
न जाने कितनी देर तक दौड़ता रहा
अमर। फिर उसके कदम धीमे हो गए। एकाएक कानों में कहीं से बाँसुरी की आवाज आई।
वह रुका और मुड़कर देखने लगा। पीछे काफी दूर सराय की इमारत में हल्की रोशनी
दिखाई दे रही थी। अमर के कदम रुक गए। वह वहीं सड़क के किनारे बैठ गया।
उसने चेहरा हाथों में छिपा लिया। जोर से रो पड़ा। उसकी समझ में नहीं आ रहा
था कि क्या करे। कई चेहरे एक साथ
आँखों के सामने तैरने लगे। कानों में तरह-तरह की आवाजें गूँजने लगीं। कभी माँ दिखाई
देती थी तो कभी रोहू की दादी हाथ में लालटेन लिए नजर आती, फिर आवाज सुनाई देती-‘बेटा अमर, तुम आते क्यों नहीं। मैं तुम्हारी राह देख रहा हूँ।’ बाँसुरी की आवाज कानों में गूँज रही थी....
अमर सराय की दिशा में देखने लगा। अब आवाज आनी बन्द हो गई। वह उठा और सराय की ओर लौट चला.... मन ही
मन कह रहा था-‘बाँसुरी बाबा ने मुझसे सच कहा है, तो मैं भी उसे
साफ-साफ बता दूँगा कि अब उसके साथ नहीं रहूँगा। हाँ,
नहीं रहूँगा। पर एक बार कहूंगा जरूर।”
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थोड़ी देर बाद अमर सराय के पास जा
पहुँचा। सराय का दरवाजा खुला हुआ था।
अन्दर रोशनी हो रही थी। दरवाजे में
घुसते ही उसने देखा-सामने कई लोग खड़े
थे,
वे धीरे-धीरे आपस में बातें कर रहे थे।
“बाबा।”
अमर ने पुकारा।
तभी सरायवाले ने बढ़कर उसका हाथ पकड़
लिया। उसे अन्दर की तरफ ले जाता हुआ
बोला-“तेरा बाबा अब नहीं है,
चल बसा.... तू कहाँ चला गया था.... कोई
आवाज सुनकर हम आए तो उसे मरा हुआ देखा।”
लेकिन अमर ने जैसे कुछ नहीं सुना। धरती
घूम गई। उसके पैर काँपने लगे। आँखें मुँद गईं,
वह बेहोश होकर गिर पड़ा।
8.
वे दोनों आए
सरायवाला बहुत परेशान था। पहले बूढ़े बाँसुरी वाले को लेकर दिक्कत हुई
थी। पुलिस आई थी। तरह-तरह के सवाल किए थे-पुलिस को लगता था, शायद बूढ़े को किसी
ने मार दिया था, क्योंकि उसके बदन पर घाव थे,
पट्टियाँ बँधी थीं। सराय में टिकनेवाले मुसाफिरों से सवाल-जवाब किए गए थे। आखिर पुलिस बूढ़े
की लाश को ले गई थी। सरकारी खर्च से उसका दाह-संस्कार कर दिया गया था।
बूढ़े के बाद अमर की परेशानी थी। वह आधी
बेहोशी की हालत में सराय के एक
कमरे में पड़ा था। थोड़ी-थोड़ी देर बाद
एक डाक्टर उसे दवा देता था। जिस
दिन अमर बेहोश हुआ था, उससे अगले रोज डाक्टर
रायजादा सराय में आए थे। कोई
व्यक्ति एकाएक बीमार हो गया था। उसी को
देखने आए थे डाक्टर। तब सरायवाले
ने अमर के बारे में बताया था। डाक्टर
रायजादा अमर को यों अकेला देखकर
हैरान रह गए थे। उन्होंने सरायवाले से
पूछा था। उसने परेशान स्वर में कहा
था-“हम तो खूब चक्कर में फंस गए डाक्टर साहब। न जाने वह बूढ़ा
भिखारी कहाँ से आ गया था सराय में। यह लड़का उसी के साथ था। देखने से किसी
भले घर का लगता है। कह नहीं सकता कि उस बूढ़े के चंगुल में कैसे फँस गया।
शायद इसे बहला-फुसलाकर घर से भगा लाया होगा वह बदमाश बूढ़ा।
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“हाँ,
ऐसा हो सकता है।” डाक्टर रायजादा ने
अमर की नाड़ी देखते हुए कहा। फिर
बोले-“बच्चा काफी बीमार है। यह पता नहीं कि इसका घर-द्वार कहाँ है?”
“कौन जाने साहब! और हम इस चक्कर में
क्यों पड़ें। आप इसे किसी तरह ठीक कर
दीजिए तो हमारी जान बचे। मैं तो उस रात
इन लोगों को सराय में जगह देकर पछता
रहा हूँ। वरना यह सब क्यों होता। यह ठीक
हो जाए और अपना रास्ता ले। मैं बस
यही चाहता हूँ।”
डाक्टर रायजादा सरायवाले की ओर देखकर
धीरे से हँसे, फिर कहा-“यह बच्चा काफी बीमार है। अगर आप इसे यहाँ नहीं रखना चाहते तो अस्पताल में दाखिल करा दीजिए।”
“नहीं,
नहीं,
अस्पताल वाले न जाने क्या-क्या
पूछताछ करेंगे।” सरायवाला घबराहट भरी आवाज में बोला-“बस, आप इतना कर दीजिए कि इसका बुखार उतर जाए और थोड़ा चलने-फिरने लगे।
फिर मैं इसे यहां से जाने को कह दूंगा। चाहे जहां जाए, मेरी बला से।” डाक्टर ने अमर को दवा दी और किसी सोच-विचार में डूबे हुए वहाँ से चल दिए।
उन्होंने सरायवाले की किसी बात का उत्तर नहीं दिया। न उन्होंने पैसे
माँगे, न सरायवाले ने दिए।
कोठरी से बाहर निकलते-निकलते डाक्टर
रायजादा दरवाजे पर ठिठक गए। एकटक चारपाई पर लेटे अमर की ओर देखते रहे।
उसकी आँखें बन्द थीं, चेहरा पीला पड़ा हुआ था। वह आधी बेहोशी की हालत में था। डाक्टर रायजादा जानते थे कि बच्चे की तबीयत काफी खराब है। उसे निरन्तर
देखभाल की जरूरत है। लेकिन सरायवाले से बात करने के बाद उनका मन कुछ परेशान
हो उठा।
डाक्टर रायजादा वहाँ से सीधे अपने
दवाखाने चले गए। काफी मरीज जमा थे।
शहर में डाक्टर का बड़ा नाम था। यों उनका पूरा
नाम आशुतोष रायजादा था, पर लोग उन्हें डाक्टर रायजादा के नाम से जानते थे। डाक्टर रायजादा
एक के बाद दूसरा मरीज देखते रहे,
पर उनका चित्त कुछ विचलित था। वह
रह-रहकर सराय की कोठरी में पड़े उस बच्चे के बारे में सोचने लगते।
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मरीजों की भीड़ कम हुई। डाक्टर
साहब उठकर घर की तरफ चल दिए। शहर की एक अच्छी बस्ती में उनका शानदार
बँगला था। वहाँ अपनी पत्नी अचला और बेटी रचना के साथ रहते थे।
घर जाकर डा. रायजादा चुपचाप
कुर्सी पर बैठ गए। हर रोज
दवाखाने से लौटने पर वह रचना से कुछ देर
जरूर हँसी-मजाक करते, पत्नी से
बातें करते, पर आज ऐसा कुछ न हुआ।
वह चुपचाप बैठे रहे। रचना उछलती हुई
डाक्टर के पास आई, उसने धीरे से पुकारा-“पापा।” पर पिता रायजादा अपने ध्यान में इस तरह खोए हुये थे कि उन्होंने अपनी प्यारी बेटी की
आवाज न सुनी। रचना कुछ देर कुर्सी के पास खड़ी चुपचाप उनकी ओर देखती
रही, फिर माँ
के पास चली गई।
दूसरे कमरे में खड़ी अचला ने भी यह सब
देखा था। वह जान गई कि डाक्टर साहब किसी बात को लेकर ज्यादा परेशान हैं।
आमतौर पर ऐसा तभी होता था,
जब डाक्टर साहब का कोई मरीज ज्यादा
बीमार होता और उनके इलाज से रोगी को कोई फायदा न हो रहा होता।
अचला ने पास जाकर कहा-“क्या बात है, तबीयत कुछ खराब है? रचना आपके पास खड़ी
रहकर चली गई, पर आपने उसकी तरफ देखा तक नहीं। उसके पुकारने पर भी नहीं बोले।”
डाक्टर रायजादा ने पत्नी की ओर देखा, फिर गम्भीर स्वर में बोले-
“कुछ ऐसी ही
बात है।उससे
मन परेशान हो उठा। समझ में नहीं आ रहा है कि क्या किया जाए।”
डाक्टर बताने लगे-“सराय में एक बच्चा
बीमार पड़ा है। वह अकेला है।” “अकेला बच्चा! क्या उसके साथ कोई नहीं है?”-अचला ने उत्सुक स्वर
में पूछा।
“सराय वाला कहता है, उस बच्चे के साथ एक
बूढ़ा भिखारी था। वह बाँसुरी
बजाकर भीख माँगा करता था। कल रात उसकी
मृत्यु हो गई। तभी से वह बच्चा बीमार
है। एकदम बेसुध पड़ा है। बहुत कमजोर हो
गया है।” पति की बात सुनकर अचला का चेहरा भी गम्भीर हो
गया। वह जानती थी कि उसके पति का मन बहुत कोमल है। वह किसी को दुखी नहीं
देख सकते। बहुत से गरीब रोगी डाक्टर साहब से मुफ्त दवा ले जाते थे। डाक्टर
उन लोगों से कभी एक पैसा नहीं लेते थे और लगातार दवाई देते रहते थे।
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अचला ने कहा-“तो इसमें परेशानी की
क्या बात है। आपने उसे दवा दी है तो ठीक हो जाएगा।”
“लेकिन
मैं उसे ज्यादा समय तक दवा नहीं दे
सकूँगा।” डाक्टर रायजादा ने कहा “और फिर उस अनाथ बच्चे का क्या होगा,
यह कहना कठिन है। हमें गाँव जाना है।”
अब अचला एकदम समझ गई कि उसके पति क्यों इतना परेशान थे। चार दिन बाद गाँव में डाक्टर साहब की बहन की शादी थी। डाक्टर साहब
को पत्नी और बेटी के साथ कल ही गाँव के लिए चल देना था। यही बात
उन्हें परेशान कर
रही थी कि अमर का इलाज बीच में छोड़कर गाँव जाना पडे़गा।
“तो फिर?”-अचला ने पूछा।
“यही सोच रहा हूँ कि क्या किया जाए। बच्चे की तबियत अभी काफी गड़बड़
है। मैं डाक्टर हूँ , जानता हूँ वह एक दिन में स्वस्थ नहीं हो सकता। सरायवाला उसे अब अपने यहाँ रखने को तैयार नहीं है। मेरे गाँव जाते ही वह
लड़के को निकाल बाहर करेगा। एक बार भी यह नहीं सोचेगा कि उस अनाथ और बीमार
बालक की मदद करनी चाहिए।”
“हमें तो जाना ही है।” अचला ने कहा।
“हाँ जाना ही है।” डा. रायजादा ने जैसे पत्नी की बात दोहराई। कमरे में चुप्पी छा गई। रचना एक कोने में चुप और सहमी-सहमी खड़ी थी। वह
बारी-बारी से कभी माँ को देखती तो कभी पिता को। उसके नन्हे
दिमाग में यह बात नहीं आ रही थी कि आज दोनों को क्या हो गया है?
रात को अचला ने डाक्टर को जगाकर कहा-“मैं उस बच्चे को देखना
चाहती हूँ।”
डाक्टर रायजादा ने घड़ी की ओर देखा। रात
का डेढ़ बज रहा था। “इस समय!” उन्होंने अचरज से कहा।
“काफी रात हो रही है।‘’
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“हाँ,
इसी समय। मुझे नींद नहीं आ रही है। हमें
देखना चाहिए कि बच्चा कैसा
है?
आपने कहा था न कि उस बच्चे की तबीयत काफी
खराब है।” अचला ने कहा।
“हाँ,
कहा तो था।” डाक्टर रायजादा बोले।
उन्होंने कपड़े पहने, तब तक अचला
भी तैयार हो गई। रचना आराम की नींद में
सो रही थी। अचला ने नौकर को जगा
दिया,
फिर दोनों पति-पत्नी कार में बैठकर सराय
की ओर चल दिए। रास्ता सुनसान
था। डाक्टर स्वयं कार चला रहे थे।
सराय का बड़ा दरवाजा बन्द था। डाक्टर ने खटखटाकर दरवाजा खुलवाया। डाक्टर तथा अचला को
इतनी रात गए वहाँ देखकर सरायवाला ताज्जुब करने लगा। “वह बच्चा कैसा है?” डाक्टर ने पूछा।
“बच्चा,
कौन बच्चा।” सरायवाला अचकचा उठा।
फिर जैसे कुछ याद आया हो, बोला-“अच्छा, उस छोकरे की बात कह रहे हैं,
जो बूढ़े के साथ आया था यहाँ।”
“हाँ,
हाँ,
वही। कैसा है?”
“जी,
मैं देख नहीं पाया। कुछ काम था, इसलिए देखने का समय न
मिला। मैंने नौकर से कह दिया था दवा
वगैरह देने के लिए।” सरायवाला बोला। वह डाक्टर से आँखें नहीं मिला पा रहा था। इतना सुनते ही डाक्टर तेजी से अमर की कोठरी की तरफ बढ़
चले। पीछे-पीछे अचला भी थी।
अमर की कोठरी में अँधेरा था और कराहने
की हल्की आवाजें आ रही थीं। डाक्टर ने दवाओं के बैग में से टार्च
निकाली। टार्च की रोशनी में अमर एक टूटी चारपाई पर लेटा हुआ दिखाई दिया, उसकी आँखें बन्द थीं। पर जैसे ही चेहरे पर टार्च की रोशनी पड़ी, उसने आँखें खोल दीं उसके सूखे होंठों से धीमी आवाज निकली, “ओह माँ! पिताजी, कहाँ हो?”
अचला बढ़कर चारपाई पर अमर के पास आ
बैठी। उसके माथे पर हाथ फिराने लगी।
उसने कहा-“अरे, इसे तो बहुत तेज
बुखार है।” डाक्टर अमर की कलाई पकड़े हुए थे। उन्होंने सिर
हिलाया, “हाँ। लगता है, इसे दवा नहीं दी गई,
कुछ खाया भी नहीं होगा।”
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तभी बाहर लालटेन की रोशनी झलकी।
सरायवाला हाथ में लालटेन थामे अन्दर घुसा।
‘’बरतन में ठंडा पानी और कपड़ा लेकर आओ।” डाक्टर ने कहा। “जल्दी।” जब तक सराय वाला बरतन में पानी लेकर आया डाक्टर ने अमर को इंजेक्शन
दे दिया। अचला उसके माथे पर गीली पट्टियाँ रखने लगी। वह ध्यान से अमर के
चेहरे की ओर देख रही थी, सोच रही थी-“कितना छोटा बच्चा है। न जाने इसके माँ-बाप कहाँ होंगे।”
अमर बीच-बीच में आँखें खोलकर अचला और डाक्टर
की तरफ देखता, उसके होंठ हिलते,
पर कोई आवाज बाहर न आती। उसकी आँखों के
सामने धुँधलका सा छाया हुआ था। वह ठीक से सोच नहीं पा रहा था। जब
अचला ने उसके सिर पर गीली पट्टियाँ रखीं तो उसने आँखें खोलकर देखा था। एक
बार लगा कि था जैसे वह घर पर लेटा हो और माँ उसका सिर सहला रही हो, फिर माँ का चेहरा खो गया। रोहू की दादी दिखाई दी। कानों में आवाजें बार-बार गूँजती
रहीं, ’बेटा....छोकरे...यहाँ आओ,
मेरे पास.... मैं कब से बाट देख रहा
हूँ।’
दवा के प्रभाव से अमर को नींद आ गई।
उसका बुखार कम हो गया था। अचला ने
पानी की पट्टियाँ रखनी बन्द कर दी थीं
और अमर के उलझे हुए बालों में
उँगलियाँ फिरा रही थी। सरायवाला कोठरी
के दरवाजे पर असमंजस की मुद्रा में
खड़ा था।
डाक्टर रायजादा ने घड़ी की ओर देखा, उन्हें अमर के पास आए हुए एक घंटा बीत चुका था। अचला ने पति की ओर देखा, फिर बोली-“इसे घर ले चलें?”
डाक्टर चुपचाप अचला की ओर देख रहे थे-“बोले, “हमें तो जाना है।”
“देखा जाएगा। पर मैं इतना जानती हूँ कि
अगर यह बच्चा यहाँ रहा तो मर
जाएगा। कितनी खराब जगह है। सराय के
अन्दर इतने लोग मौजूद हैं, एक बेसहारा
बीमार बच्चा तड़प रहा है, कोई उसे दो बूँद पानी
तक देने वाला नहीं।” कहते-कहते अचला के स्वर में गुस्सा झलकने लगा।
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डाक्टर रायजादा ने सरायवाले की ओर
देखकर कहा-“हम लोग इस बच्चे को अपने घर ले जा रहे हैं।” और उन्होंने अमर को
गोदी में उठा लिया। अचला ने एक हाथ में डाक्टर का बैग उठा लिया। सरायवाला
कोठरी में रखी लालटेन उठा लाया और रास्ता दिखाने लगा। सब चुप थे।
डाक्टर ने अमर को कार की पिछली सीट पर, अचला के पास आराम से लिटा दिया। स्वयं आगे जा बैठे . कार स्टार्ट की तो
सरायवाला झपटकर उनके पास गया। बोला-“डाक्टर साहब, क्षमा करें। मैं डर गया था कि कहीं उस बूढ़े भिखारी की तरह
इस बच्चे को भी कुछ न हो जाए। बूढ़े को सराय में जगह देने के कारण मैं
बहुत मुसीबत में पड़ गया था। पुलिस ने काफी परेशान किया था मुझे।”
डाक्टर ने सरायवाले की किसी बात का जवाब
नहीं दिया, कार स्टार्ट कर दी। उस समय तक तीन बज चुके थे। सुनसान सड़कों
पर तेजी से दौड़ती हुई कार डाक्टर के बँगले में घुसी। नौकर रचना का हाथ
पकड़े दरवाजे पर खड़ा था।
अचला ने नौकर को आवाज दी। फिर तीनों
सहारा देकर अमर को अन्दर ले गए। एक कमरे में पलंग पर उसे लिटा दिया
गया। इस बीच रचना कमरे के दरवाजे पर खड़ी अचरज से यह सब देख रही थी। सोच
रही थी-पापा यह किस लड़के को ले आए हैं।
डाक्टर ने अमर का बुखार देखा, एक इंजेक्शन और दिया और अमर के पलंग के पास कुर्सी डालकर बैठ गए।
अचला भी वहाँ आ गई। उसने रचना को गोदी में उठा रखा था। पति से बोली-“आप जाकर सो जाइए। मैं देखती रहूँगी बच्चे को।”
“अब बुखार कम हो गया है। चिन्ता की कोई बात नहीं है। सराय में बिना देखभाल के पड़ा था, इसीलिए यह स्थिति हो गई थी। मैं सिर्फ इसलिए बैठा हूँ कि अपने को अनजान
जगह में पाकर एकाएक घबरा न उठे।”
‘न जाने कौन, कहाँ का है? क्या कहानी है इसकी?” अचला ने जैसे अपने से
पूछा।
“वह सब बाद में। अभी तो यह सोचना है कि
आगे क्या किया जाए।”
“मैंने सोच लिया है।” अचला बोली, “यह भी हमारे साथ गाँव
चलेगा। वहाँ यह आपकी देखरेख में रहेगा और गाँव की ताजी हवा मिलेगी तो जल्दी
ठीक हो जाएगा। फिर देखा जाएगा।”
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“लेकिन वहां शादी है, मेहमान जुटेंगे। न
जाने कोई क्या सोच बैठे।” डाक्टर साहब सोच में डूबे थे।
“सब ठीक हो जाएगा। देखभाल मैं कर लूंगी, आप दवा देंगे। क्यों।” कहते-कहते अचला के होंठों पर हंसी आ गई। डाक्टर रायजादा भी मुसकरा दिए।
अमर आराम से सो रहा था।
9.
ओ छोटी बाँसुरी
इतनी बातें हो गई थीं,
पर अमर को कुछ पता नहीं था। हाँ, इतना जरूर मालूम था
कि अब वह सराय की अँधेरी कोठरी में नहीं, आरामदेह कमरे में, नरम बिस्तर पर लेटा है।
सुबह अचला उसे दूध और बिस्किट देने आई
तो उसने कुछ पूछना चाहा, पर अचला ने कह दिया-“अभी कोई बात नहीं करनी है। पहले तुम्हारी तबीयत ठीक हो जाए तो
फिर सब बातें पूछ लेंगे।” कहकर वह अमर के बाल सहलाने लगी।
इस बीच अमर का बदन साफ करके, उसके कपड़े बदल दिए
गए थे। नौकर बाजार जाकर कई जोड़ी नए कपड़े ले आया था। उसका बुखार कम
हो गया था। तबीयत पहले से ठीक थी,
लेकिन डाक्टर जानते थे कि अगर अमर की
ठीक तरह से देखभाल नहीं की गई तो उसकी तबीयत फिर बिगड़ सकती थी।
अचला गाँव जाने की तैयारियाँ कर रही थी।
सामान बाँधा जा रहा था। कई अटैची केस,
कई बड़े डिब्बे और न जाने क्या क्या....
अमर सोच रहा था....“न जाने कौन हैं, मुझे सराय से कहाँ ले
आए हैं और अब यहाँ छोड़कर जा रहे हैं। तो क्या मैं इस जगह
अकेला रहूँगा। रह-रहकर उसे बाँसुरी बाबा की याद आतीं. उसे लगता कि अभी बाँसुरी की आवाज सुनाई देगी और बूढ़ा बाँसुरी बजाता हुआ कमरे में घुसकर उसका हाथ पकड़
लेगा। कहेगा-“छोकरे, जल्दी से चल। अपने पिता के पास नहीं जाना क्या।” पिता, माँ ,
रोहू की दादी..... सबके चेहरे एक साथ
आँखों में तैर रहे थे। ‘पता नहीं माँ
कैसी होगी? कितना परेशान हो रही
होगी?’ वह पछता रहा था कि उस रात माँ से बिना कहे क्यों चला
आया था। ‘न जाने यह कौन सी जगह है। बूंदपुर कितनी दूर है यहाँ से। किससे पूछूं ,
कौन बताएगा?” ( क़िस्त – पांच समाप्त )== आगे
और है.
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