बुधवार, 8 जून 2016

एक छोटी बांसुरी



क़िस्त – छह
बीमार बूढ़े बांसुरी बाबा ने आखिर अमर को सच बता ही दिया कि वह उसे पिता के पास नहीं ले जा सकता. वह उसे बहका कर अपने साथ ले आया था. यह कड़वा सच सुनकर अमर का सर घूम  गया. वह सराय से निकल कर भागता चला गया. कुछ देर बाद लौटा तो पता चला कि बांसुरी बाबा मर चुका था.वह बेहोश होकर गिर पड़ा, डाक्टर रायजादा सराय में किसी मरीज को देखने आये तो उन्हें अमर के बारे में पता चला. वह एक कोठरी में बिना देखभाल अकेला पडा था. सरायवाला चाहता था कि अमर वहाँ से चला जाए.बांसुरी बाबा को लेकर पुलिस ने उसे बहुत परेशान किया था.डॉ रायजादा ने अमर के बारे में पत्नी अचला को बताया तो वह उनके साथ जाकर अमर को अपने घर ले आई. लेकिन डॉ रायजादा को अपनी बहन की शादी में गाँव जाना था. अब अमर का क्या होगा?  ( अब आगे पढ़ें )

 अमर ने पलंग पर बैठने की कोशिश की तो सिर चकरा गया। वह बहुत कमजोरी महसूस कर रहा था। अगर मैं अकेला रह गया तो कैसे क्या होगा?-यही सोचकर परेशान हो रहा था . नौकर ने सामान निकालकर बाहर रख दिया। डाक्टर साहब कार में जा बैठे। कार का इंजन स्टार्ट हो गया। खिड़की से अमर को बाहर का सबदिखाई दे रहा था। तभी अचला कमरे में आई, हँसकर बोली-आओ बेटा।
    “कहाँ?” अमर के होंठों से निकला।
    “हमारे साथ और कहाँ।कहकर अचला ने अमर का हाथ पकड़ लिया और बाहर की तरफ ले चली। कार की पिछली सीट पर रचना हाथ में खिलौना लिए बैठी थी। अचला ने अमर को उसके पास बैठने का इशारा किया और खुद भी पास बैठ गई। डाक्टर साहब ने गर्दन घुमाकर अमर की तरफ देखा और मुसकरा पड़े। बोले-सब ठीक है न।”   
    “जी।अमर कह गया।
    “तो अब चला जाए।कहकर डाक्टर साहब ने कार आगे बढ़ा दी। कुछ देर बाद उन्होंने कहा-अचला, बच्चे को दवा दी?”
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अभी देती हूँ। सब चीजें साथ लाई हूँ, आप कोई चिन्ता न करें।अचला ने कहा। फिर बैग में से निकालकर अमर को दवा दी। कार बढ़ती जा रही थी। सड़क के दोनों ओर खड़े पेड़ तेजी से पीछे की तरफ खिसकते जा रहे थे। अमर कार के शीशे  में से सामने देखता रहा। वह सोच रहा था-न कुछ पूछा, न कुछ बताया, पता नहीं अपने साथ कहाँ ले जा रहे हैं। पर जो कुछ भी था, वह पहले से आराम महसूस कर रहा था. बुखार नहीं था, बदन हल्का महसूस हो रहा था.           
    अचला स्नेह से अमर की ओर देख रही थी। उसने एक तकिया अमर के सिर के एक तरफ लगा दिया। वह आराम से सो रहा था। कार दौड़ी जा रही थी डाक्टर आशुतोष रायजादा के गाँव की तरफ।
    दो घंटे बाद, एक छायादार पेड़ के नीचे डाक्टर साहब ने कार रोक दी। वह एक छोटा-सा बाजार था। दुकानों पर चहल-पहल थी, कई रेडियो बज रहे थे। इधर-उधर कई ट्रक और बैलगाडि़याँ खड़ी थीं। डाक्टर रायजादा कार से उतरकर कुछ फल खरीद लाए।
    अचला ने धीरे से अमर को जगा दिया। कहा-अब कुछ खा-पी लो, फिर तुम्हें दवा लेनी है।अमर इधर-उधर देखने लगा। उसने चुपचाप अचला के हाथ से दूध का गिलास पकड़ लिया, कुछ बिस्किट खाए, फिर दवा ले ली। वह देखता रहा, डाक्टर साहब और अचला कार के बाहर खड़े चाय पीते हुए बातें कर रहे थे। अमर के पास ही रचना हाथ में गुडि़या थामे हुए सो गई थी। अमर तकिए पर सिर टिकाए                                            अनमने भाव से सामने देखता रहा। उसे रोहू का गाँव याद आ रहा था। वहाँ  भी  ऐसा ही पेड़ था जिसके नीचे वह और बाँसुरी बाबा जाकर बैठे थे। हाँ, यहाँ चबूतरा नहीं  था, ही कोई बस्ती थी।
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  तभी एक मीठी धुन गूँज उठी। एक गुब्बारे बेचने वाला बाँसुरी बजाता हुआ सामने से आया और कार के पास पेड़ के नीचे बैठ गया। अमर सीधा बैठ गया और ध्यान से गुब्बारे वाले की ओर देखने लगा। उसने एक लम्बे बाँस पर रंग-बिरंगे गुब्बारे बाँध रखे थे। गुब्बारे हवा में लहरा रहे थे। उनके साथ ही धागों से बँधी कुछ बाँसुरियाँ और खिलौने झूल रहे थे।
    बाँसुरी की आवाज से अमर का मन बैचैन हो उठा। उसकी उँगलियाँ जैसे मचलने लगीं। उसे अपनी छोटी सी बाँसुरी याद आई, जो पता नहीं कहाँ खो गई थी। एकाएक उसने गुब्बारे वाले को इशारा किया, फिर पुकार उठा, “ऐ भाई।
    उसकी आवाज सुनकर गुब्बारेवाला दौड़ा हुआ आया, “हाँ बाबू। क्या लेगा?”
    अमर चुप हो गया। उसने पुकारना तो नहीं चाहा था, कुछ लेना भी नहीं था, फिर भी न जाने कैसे होंठों से आप से आप आवाज निकल गई थी।
    उसने  लज्जित होकर सिर झुका लिया, पर डाक्टर साहब ने यह सब देख लिया था। वह तुरन्त वहां आए। प्यार से बोले-क्या लेना है?”
    “जी.... जी.... कुछ नहीं।अमर ने संकोच से कहा।
    “जो चाहिए ले लो। बताओ।डाक्टर साहब पूछ रहे थे।
    “मेरे पास एक बाँसुरी थी.... शायद वह कहीं खो गई।
    इतना सुनते ही डाक्टर रायजादा ने गुब्बारेवाले से एक बाँसुरी लेकर अमर को थमा दी। बोले-और जो चाहिए बता दो, संकोच न करो।
    “जी,बस.... और कुछ नहीं चाहिए।अमर किसी तरह कह गया।
    थोड़ी देर बाद कार फिर चल दी। अमर बाँसुरी हाथ में लिए बैठा था। अब पीछे की सीट पर सिर्फ वह और रचना थे। अचला भी डाक्टर साहब के साथ आगे जा बैठी थी। रह-रहकर अमर बाँसुरी होंठों से लगाता और फिर हटा लेता, फिर धीरे-धीरे वह बाँसुरी बजाने लगा। शुरू शुरू में सुर सध नहीं रहा था, उसकी उँगलियां काँप रही थीं। फिर एक मीठी धुन कार में गूँजने लगी। डाक्टर रायजादा ने कार चलाते-चलाते अचला की ओर देखा। दोनों की आँखें  मिलीं तो वे मुसकरा दिए। फिर डाक्टर ने होंठों पर उँगली रखकर चुप रहने का इशारा किया। वह चाहते थे  कि  अमर को छेड़ा न जाए।
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    अमर आँखें मूंदे बाँसुरी बजाता रहा। कार में मीठी धुन बिखरती-गूँजती रही। रचना उसी तरह गुडि़या को हाथ में लिए सो रही थी। कुछ देर बाद अमर ने बाँसुरी बजाना बंद कर दिया। अब डाक्टर साहब बोल उठे-बहुत खूब। मुझे पता नहीं था, तुम इतनी अच्छी बाँसुरी बजाते हो। तुम तो कलाकार हो। इतनी अच्छी बाँसुरी तो मैंने कभी नहीं सुनी।अचला मुसकराती हुई अमर की ओर देखने लगी। अमर के होंठों पर मुसकान आ गई। बोला-बाँसुरी बाबा ने सिखाई थी मुझे। वह बहुत अच्छी बाँसुरी बजाते थे।
    “बाँसुरी बाबा। यह कैसा नाम है!अचला ने कहा।
    “सब उन्हें इसी नाम से पुकारते थे।अमर बोला। उसे ख्याल आ रहा था, उस रात जब वह सराय में लौटा था, उसके बाद बाँसुरी बाबा वहाँ नहीं दिखाई दिया था। अमर को अब याद नहीं था कि बाँसुरी वाला बूढ़ा मर चुका था। यह बात डाक्टर और अचला दोनों ने ही छिपाई थी उससे। हालाँकि बेहोश होने से पहले सरायवाले ने भी यही बताया था उसे।
    उसके बाद अचला फिर अमर के पास जा बैठी और धीरे-धीरे उसके बारे में सवाल करने लगी। अमर एक के बाद दूसरी बात बताता गया। शुरू से लेकर आखिर तक सब कुछ। पिता की खोज में घर से निकलने से लेकर सराय में आने तक।
    अचला ध्यान से सुन रही थी। कार चलाते हुए डाक्टर रायजादा भी सुन रहे थे, पर दोनों चुप रहे। अमर की कहानी ने दोनों को चौंका दिया था। कार चलती रही। दिन में दो बार डाक्टर ने अमर का बुखार देखा, दवा दी। अब उसकी तबीयत ठीक हो रही थी। डाक्टर जानते थे कि अगर वे अमर को अपने साथ लेकर न आते, तो उसकी दशा बिगड़ सकती थी। बिना देखभाल के वह मर भी सकता था। उन्हें खुशी  थी कि उस अकेले बच्चे के बारे में उनका निर्णय ठीक था।
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    शाम ढल रही थी-सड़क पर अँधेरा हो रहा था-तब डाक्टर की कार अपने गाँव कनसारा में पहुँची। कनसारा एक छोटा-सा गाँव था। नदी किनारे बसा था। कार गाँव की धूल भरी सड़क पर चली तो सब तरफ शोर मच गया-डाक्टर आ गए। डाक्टर भैया आ गए।कनसारा के निवासी डाक्टर रायजादा की कार को खूब पहचानते थे। डाक्टर कार से ही गाँव आया-जाया करते थे।   गाँव के बीचों-बीच डाक्टर रायजादा के पिता का पक्का और बड़ा मकान था। गाँव से थोड़ा आगे नदी किनारे की जमीन पर उनके खेत थे। वह बड़े और सम्पन्न किसान थे।  कार  हवेली  के दरवाजे पर रुकी तो वहाँ काफी भीड़ जमा थी। वहाँ डाक्टर के माँ-बाप, परिवार के दूसरे लोग तथा शादी में आए मेहमान थे।
    अचला ने सहारा देकर अमर को उतारा तो सब लोग उसकी ओर देखने लगे। अमर ने आँखें उठाकर इधर-उधर देखा, फिर नजरें झुका लीं। सबकी आँखें उसी पर टिकी थीं। सब एक ही बात सोच रहे थे-यह किसे ले आए डाक्टर। शायद घरेलू नौकर होगा। पर जिस तरह अचला अमर को सहारा देकर हवेली में ले गई उससे तो ऐसा नहीं लगता था। घर में अमर को लेकर चर्चा  होने लगी।
    डाक्टर ने किसी की बात का जवाब नहीं दिया। सबसे पहले उन्होंने एक कमरे में अमर का बिस्तर लगावा दिया। उसे लेटने को कहा। बोले-अमर, तुम सफर से थक गए होंगे, थोड़ी देर आराम कर लो। कल यहाँ मेरी बहन की शादी है। शादी के बाद तुमसे बात करूँगा। मैंने तुम्हारी पूरी बात समझ ली है। तुम जहाँ कहोगे वहाँ पहुँचा देंगे।कहकर डाक्टर कमरे से बाहर चले गए
    पलंग के पास खिड़की थी। उससे हवेली का आँगन दिखाई देता था। आँगन में खूब रोशनी थी। रंग-बिरंगे कपड़े पहने कई औरतें वहाँ बैठी थीं। उनमें अचला भी नजर आई। फिर उसने अचला को एक तरफ जाते देखा। कुछ देर बाद अचला दूध और दवा लेकर अमर के पास आई। अमर ने दवा ले ली, फिर बोला-क्या आप मुझे माँ के पास ले जाएँगी?”   
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    “हाँ हाँ, क्यों नहीं। जरूर ले जाएंगे, पर अभी नहीं, पहले शादी का काम पूरा हो जाए। तुम्हारी तबीयत सुधर जाए, फिर चलेंगे।थोड़ी देर अमर के पास बैठकर अचला नीचे चली गई। अमर चारपाई पर लेटा-लेटा आँगन में होती हलचल देखता रहा, सोचता रहा।
    अब उसका मन शान्त था-उसे माँ की याद आ रही थी।
   

10.    अँधेरे के पार

अगले दिन डाक्टर आशुतोष  की बहन का विवाह था। बारात दूर से आई थी। ढेर सारे लोग, खूब रोशनी, कितनी चहल पहल।
    अचला के कहने पर अमर ने नए कपड़े पहने, फिर आँगन में पड़ी कुर्सी पर जाकर बैठ गया। वहाँ बहुत सारे मेहमान बैठे थे। सब उसकी ओर देखते हुए कुछ बातें करने लगते। अमर की समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर उसके बारे में क्या बातें कर रहे थे।
    तभी अचला ने कहा-अमर बेटा, अब तुम अपने कमरे में जाकर सो जाओ, नहीं तो थकान से फिर बुखार आ जाएगा।
    “नहीं, मैं शादी देखूँगा। अब मेरी तबीयत ठीक है।अमर ने कहा तो अचला हंस पड़ी। बोली-अगर ऐसा है तो मजे से बैठो।
    अमर सब लोगों के बीच आँगन में बैठा रहा। उसने शादी का पूरा कार्यक्रम देखा। उसे बड़ा मजा आया। डाक्टर साहब की बहन लाल साड़ी में सुन्दर लग रही थी और दूल्हा उसे देखकर कैसे हँस रहा था।
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    विवाह का कार्यक्रम पूरा हुआ।
    उसके बाद सबने दूल्हे से गाना सुनाने को कहा। दूल्हे ने दो गीत सुनाए, और भी कई लोगों ने गाया। अचला ने भी एक भजन सुनाया। तभी डाक्टर साहब ने कहा-आप जानते हैं, यह बच्चा बहुत अच्छी बाँसुरी बजाता है!
    सबकी नजरें अमर की तरफ मुड़ गईं। अमर शर्म से लाल हो उठा। तभी डाक्टर ने बाँसुरी उसकी तरफ बढ़ा दी। वह हँस रहे थे। बोले-अमर, जरा सबको बताओ तो सही कि तुम कितनी अच्छे कलाकार हो।
    “हाँ, हाँ, अमर। बजाओ।यह अचला की आवाज थी।
    अमर ने बाँसुरी होंठों से लगा ली और बजाने लगा। अत्यन्त मधुर सुर गूँजने लगा। सन्नाटा छा गया। सब प्रशंसा के भाव से उस छोटे से बच्चे की ओर देख रहे थे। बहुत होनहार बच्चा है। आगे चलकर बहुत बड़ा कलाकार बनेगा।किसी ने कहा। कुछ देर बाद अमर ने बाँसुरी रख दी और आँगन तालियों से गूँज उठा। कई लोगों ने आकर अमर की पीठ थपथपा दी। अमर का  मन  खुशी से भर  उठा। वह सोच रहा था-अगर इस समय माँ होती तो कितना अच्छा लगता।
    थोड़ी देर बाद डाक्टर रायजादा की बहन की विदाई हुई। वह दूल्हे के साथ कार में जा बैठी। उन्हें विदा देने के लिए सब लोग गाँव से बाहर तक गए। अमर भी साथ था। कार फूलों से सजी हुई थी। आगे-आगे बैंड बज रहा था। कार के पीछे, दाएँ-बाएँ डाक्टर साहब के परिवार के लोग थे। महिलाएँ उदास थीं, कुछ आँचल से आँखें पोंछ रही थीं। एकाएक अमर ने महसूस किया, उसकी आँखें भी धुँधली हो गई हैं। वह रो रहा था, न जाने किसके लिए।
    सब लोग काफी देर गाँव के बाहर खड़े रहे। फिर धीरे-धीरे हवेली की तरफ लौट आए। थोड़ी देर तक सब चुपचाप बैठे रहे-अमर थकान महसूस कर रहा था। वह जाकर चारपाई पर लेट गया और आँखें बन्द कर लीं।
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    तभी कमरे में कदमों की आहट सुनाई दी। अमर को लगा कोई कमरे में धीरे-धीरे चल रहा है। उसने देखा डाक्टर साहब थे। वह उठने लगा तो डाक्टर साहब ने रोक लिया। बोले-लेटे रहो। अभी तुम्हें कुछ दिन और आराम की जरूरत है।
    “जी, अब मैं ठीक हूँ।अमर ने कहा।
    “देखो भई, मैं हूँ डाक्टर। और मैं तुम्हारे बारे में तुमसे ज्यादा जानता हूँ।डाक्टर साहब हँसकर बोले-तुम पहले से ठीक हो, पर इतने ठीक नहीं हो जितना तुम्हें होना चाहिए। अभी तुम्हें दवा और आराम दोनों चाहिएं, समझे।कहकर उन्होंने धीरे-से अमर का कन्धा थपथपा दिया। फिर बोले-तुम्हारी दवाई का समय हो रहा है। मैं दवाई लाता हूँ, उसके बाद तुम्हें आराम करना है। ताकि फिर सफर कर सको।”   
    “हम कहाँ जाएँगे, डाक्टर साहब?”
    डाक्टर रायजादा मुसकराते हुए अमर की ओर देखते रहे, बोले नहीं। उनकी बात ने अमर के मन में खलबली मचा दी। वह समझ न सका कि डाक्टर साहब कहाँ जाने के लिए कह रहे हैं। क्या वह पिताजी के बारे में कुछ जानते हैं, या बाँसुरी बाबा की तरह बाद में मना कर देंगे। बाँसुरी बाबा का ख्याल आते ही अमर उदास हो गया। बूढ़े के साथ बिताए गए दिन याद आने लगे। फिर रोहू का ख्याल आया। उसे साँप ने काट लिया था, पता नहीं अब कैसा होगा और बाँसुरी बाबा कहाँ चला गया भला! फिर दिखाई ही नहीं दिया। उसका मन माँ से मिलने को बैचैन हो उठा। वह  सिर झुकाए सोच में डूबा बैठा रहा गया। ( क़िस्त छह समाप्त ) आगे और है
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