मंगलवार, 26 अप्रैल 2016

एक छोटी बांसुरी



अमर अपने पिता की गोद में बैठना चाहता था, लेकिन वह तो घर में थे ही नहीं. अमर माँ से रोज पूछता था –‘ पिताजी कब आयेंगे ?लेकिन माँ कुसुम के पास कोई जवाब नहीं था. असल में अमर के पिता युद्ध के मोर्चे से लापता हो गए थे. कुसुम कह देती थी  –‘ जल्दी ही आयेंगे तेरे पिताजी. ‘लेकिन यह झूठी तसल्ली अमर को अब और नहीं बहला सकती थी. उसने तय किया कि वह खुद पिता की खोज में जाएगा. और एक रात जब कुसुम गहरी नींद में थी तो   .

प्रथम क़िस्त

हर दिन ऐसा ही होता था। अमर स्वयं से एक ही प्रश्न पूछता था, लेकिन उसे कोई उत्तर नहीं मिलता था।
    शाम को सूरज डूबने लगता तो अमर को जैसे कोई भूली हुई बात याद आ जाती। दिन भर वह चाहे कहीं भी रहता पर उस समय घर की छत पर अवश्य पहुंच जाता। अमर की माँ का नाम कुसुम था। माँ ने उसे कई बार चुपचाप सीढि़यों से ऊपर जाते हुए देखा था। वह हैरान हुई थी कि बेटा शाम के समय ऊपर छत पर अकेला क्या करने जाता है? जब कई दिनों तक बहुत सोचने पर भी कुछ न समझ सकी तो दबे पाँव ऊपर जाकर देखा कि अमर क्या कर रहा है?
    अमर छत की मुंडेर पर दोनों कुहनियाँ टिकाए आगे की तरफ झुका हुआ खड़ा था और उसकी आँखें सड़क पर जमी हुई थीं। वह न जाने क्या देखने में मगन था कि माँ के कदमों की आहट भी न सुन सका। वैसे अगर वह पीछे मुड़कर देखता भी तो माँ नजर न आती। क्योंकि वह सीढि़यों  पर दरवाजे की ओट में छिपी हुई, एकटक बेटे की ओर देख रही थी। वह बेटे को चौं  काना नहीं चाहती थी।
    सड़क पर अभी बत्तियाँ नहीं जली थीं, ऊपर पूरब में आकाश का रंग काला हो चला था। एक तारा झलकने लगा था।  पश्चिम में गहरी लाली छा गई थी जो धीरे-धीरे कालेपन में बदलती जा रही थी।
    गउएँ बस्ती में लौट रही थीं। उनके गले में बँधी घंटियों की टिनटिन टिंडग टन-टन का मीठा संगीत हवा में निरन्तर गूँज रहा था। इधर-उधर पेड़ों पर पंछी उतरने लगे थे। पत्तों में सरसराहट थी, शोर था। दिन भर चुप रहने के बाद पेड़ जैसे जाग उठे थे और तरह-तरह की आवाजों में बोल रहे थे। सुबह से घोंसलों में माँ-बाप के लौटने की प्रतीक्षा करते नन्हे परिन्दे अपनी बात कहना चाहते थे-चूँ चूँ चिर्र चिर्र किर्र क्रेंक-कर्र गर्र की आवाजें सुनाई दे रही थीं।
    सड़क पर बैलगाडि़याँ थीं, सिर पर पोटलियाँ उठाए जल्दी-जल्दी कदम बढ़ाते लोग थे। दिन भर मेहनत करने के बाद अब हर कोई जल्दी से जल्दी घर पहुँचना चाहता था। 
    कुछ देर में सड़क पर भीड़ कम हो गई। पेड़ों पर मचता  शोर  थम  गया।  सारा  आकाश काला  हो उठा। यहाँ से वहाँ तक तारे बिखर गए। पर अमर अब भी उसी तरह खड़ा था। उसकी आँखें कुछ ढूँढ़ रही थीं। किसी की प्रतीक्षा थी उसे। रोज की तरह आज भी कोई उनके घर की तरफ आता नहीं दिखाई दिया था।
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    हर दिन ही तो ऐसा होता था- अमर किसी की प्रतीक्षा में छत पर जा खड़ा होता था। वहाँ से दूर-दूर तक देखा जा सकता था-सड़क से परे खेत और फिर पेड़, जो आगे जाकर घने वन का रूप ले लेते थे। सड़क उस वन से गुजर कर बहुत दूर, न जाने कहाँ तक जाती थी। इस बारे में अमर कुछ नहीं जानता था। पर कितनी ही बार उसका मन करता था कि उस सड़क पर दौड़ता जाए, दौड़ता जाए।
    आँखें ढूँढ़ ढूँढ़कर थक जाती थीं, पर वह कहीं नजर न आते थे। न जाने पिताजी कब आएँगे? अमर हर दिन स्वयं से यह पूछता था। शाम को अँधेरा हो जाने के बाद उसका मन टूटने लगता था। क्योंकि एक उसका घर ही ऐसा था जहाँ कोई नहीं आता था। पिता के इन्तजार में एक दिन और बीत जाता था।
     अमर छत पर फैले अंधेरे में खोया खड़ा था। और सीढि़यों से माँ उसे देख रही थी। वह समझ चुकी थी कि अमर क्यों खड़ा है? किस की प्रतीक्षा है उसे। आखिर वही प्रश्न तो उसका भी था। बस एक फर्क था  --अमर माँ से हर रोज पूछता था-माँ, पिताजी कब आएँगे?  ‘’ और कुसुम आंसू रोकती हुई जवाब देती थी-जल्दी ही आएंगे  मेरे बेटे। बहुत जल्दी आएँगे।लेकिन कुसुम यह प्रश्न किसी से नहीं पूछ सकती थी। क्योकि जवाब कोई नहीं दे सकता था.वह इस कडवी सच्चाई से खूब अच्छी तरह परिचित थी. उसकी यही कोशिश रहती थी कि पिता की याद में अमर ज्यादा बेचैन न हो उठे।
    कुसुम किवाड़ के पीछे से छत की मुंडेर पर कुहनियाँ टिकाए खड़े अमर को देखती रही। फिर धीरे-धीरे बढ़कर उसके निकट जा खड़ी हुई। लेकिन अमर का ध्यान अब भी भंग नहीं हुआ। वह उसी तरह अपने में खोया खड़ा था। कुसुम ने हौले से बेटे के कन्धे पर अपनी हथेली टिका दी।
अमर का बदन कुछ कंपकंपाया, वह घूमा और माँ से लिपटकर सिसकने लगा। बेटे की आँखों से बहते आँसू माँ का मन भिगोते रहे। उसकी अपनी आँखें भी डबडबा आईं। पर कुसुम ने आँसुओं को बाहर न आने दिया। वह अमर के बाल सहलाती खड़ी रही। फिर झुककर बेटे का माथा चूम लिया। रुँधे गले से बोली-रोता क्यों है पगले। मैंने कहा है न, तेरे पिताजी जल्दी ही वापस आएँगे। अभी थोड़ी देर पहले ही किसी ने उनके बारे में खबर दी थी। मैं तुझे बताना ही  भूल  गई।अरे हाँ मैं तुझे बतलाती कैसे ! तू तो मुझसे मिला ही नहीं , बाहर से सीधा छत पर जो चला आया।
    माँ की बात सुनकर अमर के आँसू एकाएक थम गए। मन में आशा की  एक लहर उठी जैसे अंधेरे में रोशनी चमक उठे। पर फिर उदास हो उठा। इस तरह की बातें तो माँ पहले भी कई बार कह चुकी है, पर पिताजी आए कभी नहीं। न जाने कहाँ खो गए हैं। इतने दिन में उसे पता चल चुका था कि बहुत-सी बातें माँ उसका मन रखने को कहती है।
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    दोनों कुछ देर छत पर खड़े रहे। हवा तेजी से बह रही थी। कुसुम ने प्यार से बेटे के बाल सहला दिए, फिर उसे सहारा देती हुई सीढि़यों से उतरने लगी।
    अमर ने माँ के बहुत समझाने-बुझाने पर थोड़ा-सा भोजन किया, फिर चारपाई पर लेट गया। कुसुम ने रसोई का काम निबटाया। मन नहीं था, फिर भी थोड़ा-सा खाया और बेटे के पास बैठकर उसका सिर थपकने लगी, जिससे वह सो जाए। कुछ देर उनके छोटे से घर में सन्नाटा छाया रहा। कहीं दूर पेड़ पर कोई परिन्दा दो बार विचित्र आवाज में बोल उठा। फिर खामोशी छा गई।
    कुसुम समझी अमर सो गया और उठने लगी, पर तभी अमर ने कहा-माँ, बताओ न, किसने खबर दी है पिताजी के बारे में। कौन आया था? पिताजी कब आएँगे?”
    अमर की बात सुनकर कुसुम एकदम चौंक उठी। वह सोच न पाई कि क्या कहे। उसने तो अमर का  ध्यान बंटाने के लिए ऐसे ही कह दिया था, ताकि बेटे की उदासी कुछ कम हो जाए। न कोई आया था, न किसी ने कुछ बताया था। पिछले आठ सालों से अमर के पिता नरेश का कुछ पता नहीं था। वे सेना में थे।
    अमर के जन्म लेने से कुछ पहले की बात थी। देश की सीमाओं पर युद्ध छिड़ा हुआ था। नरेश  युद्ध के मोर्चे पर गए थे। एक दिन शत्रु सेना से भयानक मुठभेड़ की खबर मिली थी। फिर पता चला कि वह लापता हो गए हैं। कोई नहीं जानता कि उन्हें क्या हुआ था।    
    अमर का जन्म हुआ था तो पति को याद करके कुसुम बहुत रोई थी। दुनिया में और कोई भी नहीं था उसका। पड़ोसी ही आकर हालचाल पूछ लेते थे, उसे धीरज बंधा जाते थे। दूर गाँव में कुसुम के बूढ़े पिता रहते थे। बहुत दिनों से कुसुम उनसे मिलने भी नहीं जा सकी थी। उनकी भी कुछ खबर नहीं थी।
    समय बीतता रहा-हर सुबह कुसुम को उम्मीद रहती थी कि अमर के पिता का कोई समाचार अवश्य मिलेगा, पर उसकी आशा कभी पूरी नहीं हुई। जब मन ज्यादा उदास होता तो वह अमर  को गोदी में लेकर बैठ जाती। इस तरह उसे अपना दुख कुछ कम होता हुआ लगता था।   धीरे-धीरे महीने और फिर वर्ष बीतने लगे। अब अमर इतना बड़ा हो गया था कि उसे केवल लोरी सुनाकर नहीं सुलाया जा सकता था। कोई मिठाई उसके हर प्रश्न का उत्तर नहीं हो सकती थी। वह दूसरे बच्चों को अपने पिता की गोदी में हँसते-खिलखिलाते देखता तो उसकी उदास आँखें कुछ ढूँढ़ने लगतीं। मन में एक प्रश्न उभरता-मैं अकेला क्यों हूँ
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    इसी तरह आठ वर्ष बीत गए थे। अमर के पिता का कुछ पता नहीं चला। अब कुसुम को अमर के एक प्रश्न का उत्तर बार-बार देना पड़ता था। हर रात को अमर माँ के पास लेटता तो घर का सूनापन उसे ज्यादा परेशान करता। वह माँ की छाती में मुँह छिपाकर एक ही प्रश्न पूछता-   पिताजी कब आएँगे माँ?”     
    कुसुम चुपचाप बेटे के माथे पर हाथ फिराती रहती। कुछ कहकर उसका मन बहला देती। पर वह जानती थी कि इस तरह अमर की बैचेनी बढ़ती जाएगी।
    एक रात कुसुम की नींद टूटी तो हड़बड़ा कर उठ बैठी। उसका मन घबरा उठा। देखा अमर चारपाई पर नहीं था। फिर खुले दरवाजे पर नजर जा टिकी। दौड़ती हुई बाहर आई। वह जोर-जोर से चिल्ला रही थी-अमर बेटा! अमर!
    कुछ देर बाद अमर की आवाज सुनाई दी-मां, मैं यहां हूं।
    कुसुम ने देखा, अमर अंधेरे में सड़क के किनारे खड़ा था। उसने दौड़कर बेटे को गोदी में भर लिया। रुँधे गले से बोली-कहाँ जा रहा था, पगले? बोल।  माँ को छोड़कर कहां जा रहा था?’’
    अमर माँ के साथ घर में चला आया। कुसुम ने सावधानी से घर का दरवाजा बन्द किया और बेटे का सिर गोदी में रखकर बैठ गई। एकाएक अमर बोला-माँ, मैंने सपने में पिताजी की देखा था। वह आए और खिड़की से बाहर खड़े हो गए।
    उस घबराहट में भी कुसुम के चेहरे पर मुसकान आ गई। तुझे कैसे पता?”
    अमर एक पल को हड़बड़ा गया, फिर बोला-इससे क्या! उन्होंने स्वयं कहा-अमर बेटा, मैं तुम्हारा पिता हूं।
    “फिर क्या हुआ?” कुसुम ने पूछ लिया।
    “फिर.... फिर.... सपना टूट गया। आँख खुल गई।
    “पर तू बाहर क्यों गया था इस समय।कुसुम ने कुछ गुस्से से कहा।
    “ माँ, मुझे लगा था जैसे पिताजी ने पुकारा हो-अमर बेटे, यहाँ आओ।बस, मैं उठकर बाहर देखने गया था कि कौन है, तभी तुम आ गईं।
    अमर की बात सुनकर कुसुम का मन किसी अनजानी आशंका से कांप उठा। कहीं ऐसा तो नहीं कि..... वह इससे आगे न सोच सकी, आँखें बन्द करके लेट गई।
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    थोड़ी देर में कुसुम को नींद आ गई, पर अमर का मन बैचेन था। अब उसे माँ के कहने पर भरोसा नहीं होता था। उसे लगता था जैसे पिता नाराज होकर कहीं जा छिपे हैं। जब तक कोई बुलाकर नहीं लाएगा, वह आने वाले नहीं। लेकिन किससे पूछे? कौन बताएगा कि पिता कहां है?
    आज स्कूल में मास्टरजी ने एक कहानी सुनाई थी। कहानी एक बच्चे की थी, जो अपने खोए हुए भाई की खोज में जाता है और अन्त में भाई को ढूंढ़कर घर ले जाता है। बार-बार वही कहानी उसके मन में घूम रही थी। वह सोच रहा था-अगर मैं पिताजी की खोज में जाऊँ तो... लेकिन माँ नहीं जाने देगी।
    हर दिन बीतने के साथ अमर का यह विचार पक्का होता जा रहा था कि उसे भी पिता की खोज करनी चाहिए।
    वह एक ऐसी ही रात थी-अंधेरा और सन्नाटा। कुसुम पास वाली चारपाई पर नींद में बेसुध थी-पर अमर की आँखों से नींद बहुत दूर थी। वह सोच रहा था-उस लड़के की कहानी जो अपने खोए हुए भाई की खोज में निकलता है और उसे ढूंढ़कर ले आता है। यही सब सोचते-सोचते वह न जाने कब नींद में डूब गया।
    कुछ देर बाद कोई आवाज सुनकर अमर की नींद टूट गई। घर में अंधेरा था। पास की चारपाई पर माँ के खर्राटे लेने की धीमी आवाज आ रही थी। अमर कान लगाकर सुनता रहा। उसने सपने में देखा था-सैनिक की वर्दी में एक व्यक्ति घर की ओर बढ़ रहा है। वह आता है और खिड़की के पास खड़ा हो जाता है। बहुत कोशिश करके भी अमर उस व्यक्ति का चेहरा नहीं देख पाया। उसे आवाज सुनाई दी-अमर बेटा।”   
    अमर हड़बड़ा कर उठ खड़ा हुआ। एक बार सोती हुई माँ की ओर देखा, फिर धीरे से दरवाजा खोलकर बाहर निकल आया। सब तरफ अंधेरा था, सड़क पर दूर-दूर पीली बत्तियाँ चमक रही थीं। और कहीं कदमों की आहट उभर रही थी। धीरे-धीरे बढ़कर अमर सड़क  के  किनारे  जा खड़ा हुआ। उसने देखा सड़क पर कुछ लोग चुपचाप चले जा रहे थे।
    अमर एकटक देखता रहा। वे लोग पंक्तिबद्ध होकर चले जा रहे थे। उन्होंने एक जैसे कपड़े पहने हुए थे। अमर सोचता रहा-ये लोग कौन हैं, कहां जा रहे हैं?” और फिर एकाएक याद आ गया। वह जैसे अपने से बोला-ये सैनिक हैं, सैनिक.... मेरे पिता की तरह।घर में पिता के कई चित्र थे उस तरह की वर्दी में।
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    लेकिन यह कैसे पता चले कि सैनिक कहां जा रहे हैं? किससे पूंछूं, कौन बताएगा? यह सोचते हुए अमर ने इधर-उधर देखा। थोड़ी दूर पर एक बूढ़ा खड़ा था। अमर बूढ़े के निकट गया। उससे बोला-बाबा, ये लोग कहां जा रहे हैं?”   
    बूढ़े ने कुछ चौंक कर अमर की ओर देखा, फिर बोला-ये सैनिक हैं। मैं कई दिनों से सैनिकों को इस तरह रात में जाते हुए देख रहा हूं। लेकिन यह पता नहीं ये कहाँ जा रहे हैं?” फिर कुछ रुककर बोला-बच्चे, तू यह सब क्यों पूछ रहा है? जा, घर में जा। देखता नहीं आधी रात हो रही है। नहीं, तो अभी तेरे पिता ढूंढ़ते हुए आएँगे।
    अब अमर अपने पर काबू न रख सका। उसने कहा-बाबा, मेरे पिता भी सेना में हैं। पर वह बहुत दिनों से घर नहीं आए। क्या ये लोग जानते होंगे उनके बारे में?”
    बूढ़ा कुछ पल सड़क पर जाते हुए सैनिकों को देखता रहा। फिर धीरे से बोला-क्या पता  शा  यद जानते हों। तुम चाहो तो पूछकर देख लो किसी से।
    अमर की निगाहें सड़क पर जाते सैनिकों पर गड़ गईं। वह सोच रहा था-शायद ये लोग वहीं जा रहे हों, जहां मेरे पिता हैं। लेकिन किससे पूछूं, कौन बताएगा? इसी ऊहापोह में डूबा अमर सड़क के किनारे खड़ा सामने से गुजरते सैनिकों को देखता रहा। सैनिक चुपचाप चले जा रहे थे-उस सड़क पर जो जंगल की ओर जाती थी।
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    एकाएक एक सैनिक ने हंसकर अमर की ओर देखा और फिर आगे बढ़ गया। बदले में अमर भी मुसकरा दिया। अमर को लगा कि शायद इस आदमी से अपनी बात कही जा सकती है। पिताजी के बारे में पूछा जा सकता है। लेकिन जब तक पूरी बात सोच पाता, वह सैनिक दूसरों के साथ आगे चला गया था। अमर भी साथ-साथ बढ़ चला। उसकी आँखें उस सैनिक को खोज रही थीं जो उसे देखकर हंसा था। कौन था वह? अभी-अभी तो दिखाई दिया था! इतनी ही देर में न जाने कहां खो गया था। अमर की आँखें उसकी खोज में इधर से उधर दौड़ती रहीं। अनजाने ही उसके पैर सैनिकों के साथ-साथ आगे बढ़ने लगे थे-उसी सड़क पर जो जंगल, पहाड़ पार करके  न जाने कहां तक जाती थी।
     थोड़ी देर बाद अमर ने अपने को सैनिकों की टुकड़ी के बीच उनके साथ-साथ चलते हुए पाया। उसके कदम साथ-साथ उठ रहे थे। दिमाग में बस एक ही बात थी-ये सब लोग शायद वहीं जा रहे हैं, जहां उसके पिता हैं। हो सकता है, इस तरह इनके साथ वह अपने पिता के पास पहुंच जाए।
    चलते-चलते अमर के पैर थक गए। आँखें थकान और नींद से बोझिल होने लगीं। उससे चला नहीं जा रहा था। अनजाने ही वह घर से काफी दूर चला आया था। उसकी माँ को कुछ पता  नहीं था। वह घर में सो रही थी।
    जब न चला गया तो अमर सड़क के किनारे बैठ गया। चारों ओर घना अंधेरा था-बस्ती की रोशनियां कहीं बहुत पीछे छूट चुकी थीं। उसकी आंखें मुंदने लगीं। अमर को नींद आ रही थी। थोड़ी देर बाद वह सुनसान सड़क के किनारे, ऊबड़-खाबड़ जमीन पर नींद में बेसुध पड़ा था। अब दूर-दूर तक कहीं कोई नहीं था। सैनिकों की टुकडि़याँ दूर जा चुकी थीं। अमर खोए हुए पिता जी की खोज में घर से निकल आया था। परिन्दे पेड़ों में सो रहे थे लेकिन अमर.....
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2.    बाँसुरी बाबा

आकाश  की कालिमा फीकी पड़ गई थी। तारे चमक खो चुके थे। जंगल धीरे-धीरे जाग उठा था। पहले एक पंछी बोला था। थोड़ी देर बाद किसी दूसरे परिन्दे ने उसकी पुकार का जवाब दिया, फिर सब घोंसलों में जगाहट हो गई। जंगल में तरह-तरह की आवाजें गूजने लगीं, फिर अमर की नींद खुल गई।
    खुली नहीं, नींद इस तरह टूटी जैसे कोई शीशे पर ढेला मारकर उसे तोड़ दे। अमर उछलकर उठा और फटी-फटी आँखों से इधर-उधर देखने लगा-दोनेां और ऊँचे तथा घने पेड़। पेड़ों के नीचे बिछी लम्बी काली सड़क, जो इस समय एकदम सुनसान थी। अमर का दिल जोर से धड़क उठा। यह कहां आ गया मैं।और फिर धीरे-धीरे सारी बातें याद आ गईं। रात में घर से बाहर सैनिकों को जाते हुए देखना, बूढ़े से बातचीत और फिर.... फिर.... एक सैनिक के पीछे चल पड़ना, जो उसे देखकर मुसकराया था। फिर न जाने कब नींद आ गई थी। यह कैसे हो गया था! अमर की समझ में नहीं आ रहा था कि वह माँ को बिना बताए इस तरह घर से कैसे चला आया था।
    उसे एकाएक माँ की याद आई थी। घबराहट भरी नजरों से कभी इधर तो कभी उधर देखने लगा। सब तरफ ऊँचे घने पेड़, झाड़-झंखाड़, पशु-पक्षियों की आवाजें। कुछ भी तो नहीं था जिससे अमर को तसल्ली मिलती। सब एकदम अनजान, अपरिचित। वह पिता को खोज नहीं सका था और माँ से भी दूर चला आया था।
    “मां! माँ!अमर ने जोर से पुकारा और रो पड़ा। वह जानता था कि माँ कितना परेशान हो रही होगी। रात में नींद खुलने पर जब माँ ने उसे चारपाई पर न देखा होगा तो क्या हालत हुई होगी। यही सोच-सोचकर बुरी तरह घबरा गया था अमर। इस समय जल्दी से जल्दी वापस घर पहुँचना चाहता था-लेकिन कैसे जाए? जहां तक नजर जाती, हरियाली का विस्तार था। आकाश में परिन्दों का शोर था, घास पर उड़ते हुए कीट-पतंगे थे।
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    अमर सड़क के बीचों बीच खड़ा सोच रहा था कि क्या करे, तभी कानों में एक सुर आया-बाँसुरी की मीठी आवाज... वह अचकचा कर आवाज की दिशा  में देखने लगा। आवाज जंगल में बाईं ओर से आ रही थी। थोड़ी देर में अमर को एक बूढ़ा नजर आया।
    वह बाँसुरी बजाता हुआ धीरे-धीरे अमर की ओर चला आ रहा था। बीच-बीच में बाँसुरी बजाना बन्द करके गोल-गोल घूमने लगता था। उसने एकदम काले कपड़े पहन रखे थे-चेहरे पर दाढ़ी थी। इस तरह बाँसुरी बजाता हुआ वह बूढ़ा उस जगह आ पहुंचा जहां अमर खड़ा था।
    अमर से आँखें मिलते ही बूढ़ा जोर से हंसा फिर उसके चारों ओर नाच-नाच कर बाँसुरी बजाने लगा। न जाने क्यों अमर कुछ डर गया। उसके होठों से निकला-माँ! माँ!’’
    अमर की आवाज सुन बूढे़ ने बाँसुरी होंठों से हटा ली। अमर के पास ही जमीन पर बैठ गया और झोले में से एक कटोरा निकालकर उसके सामने हिलाने लगा। उसके होठों से आवाज निकली-ला.... डाल दे इसमें....”   
    “मेरे पास कुछ नहीं है बाबा। मुझे भूख लगी है।अमर ने सहमे स्वर में कहा।
    “क्या कहा! तेरे पास कुछ नहीं है और तुझे भूख भी लगी है। अरे, मैं पूछता हूं तू है कौन! और यहां क्या कर रहा है। क्या तेरे साथ कोई नहीं है?” बूढ़े ने पूछा और अमर को अपनी बड़ी-बड़ी, लाल आँखों से घूरने लगा।
    “बाबा, मेरे साथ कोई नहीं है। मैं रात को घर से आया था। पिताजी को ढूँढ़ने निकला था। पर रास्ता भूल गया। चलते-चलते थक गया फिर नींद आ गई। पता नहीं यह कौन-सी जगह है।घबराए स्वर में अपनी बात कह गया अमर।
    बूढ़ा ध्यान से उसकी बात सुन रहा था, बीच-बीच में हूं हूँ करता जाता। कहां रहता है तू?”
    “बूंदपुर में घर है हमारा।
    “बूंदपुर.....बूढ़े ने कहा और आँखों में अचरज भरकर उसकी ओर देखा। यह जगह तो बहुत दूर है। रात में ही इतनी दूर आ गया तू! कमाल है।फिर कुछ देर चुप रहकर बोला-तू अपने पिता से मिलना चाहता है न?”   
    “हाँ, बाबा।
    “तेरे पिता को मैं जानता हूँ। तूने उनका नाम लिया है और मैं समझ गया। मैं भी सेना में रहा हूँ। हम दोनों साथ-साथ थे.... तेरी सूरत एकदम अपने पिता से मिलती है।
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    “बाबा, मुझे उनसे मिला दीजिए.... मुझे बताइए वह कहां हैं? मैं तो कब से मिलना चाहता हूं उनसे। बताइए न।कहते-कहते अमर के होंठ कांपने लगे, आँखों में आँसू झलक आए।
    अमर को रोते हुए देख बूढ़ा जोर से हंस पड़ा। बाँसुरी उठाई और बजाने लगा। फिर बोला....
घबरा मत... मैं ले चलूंगा, पर तुझे मेरा कहना मानना पड़ेगा। मैं ठहरा बूढ़ा आदमी... धीरे-धीरे चलूंगा। जल्दी मत करना।”   
    “नहीं, जैसे आप कहेंगे, करूँगा, पर मुझे पिताजी से मिला दीजिए...”   
    “जरूर मिला दूँगा... जल्दी ही मिला दूंगा...
    अमर के आँसू थम गए। मन में उम्मीद जाग गई कि अब वह अपने पिता से मिल सकेगा। उन्हें माँ के पास ले जा सकेगा। अहा! पिताजी को देखकर माँ कितनी खुश होंगी। पिता से मिलते ही वह एक बात जरूर पूछेगा-इतने दिन से कहां छिपे बैठे थे। घर क्यों नहीं आए थे? क्या वह माँ से नाराज थे। लेकिन क्यों? इसी तरह के विचारों में खोया हुआ अमर सड़क के बीचोंबीच खड़ा रह गया। उसके होंठों पर हल्की सी हँसी थी और आँखों में एक चमक। उसे लग रहा था, बस अब वह पिता के पास पहुँचने वाला है। जब वह पिता को लेकर घर पहुँचेगा तो माँ उसे गोद में भर लेगी और....और....
    एकाएक उसके विचारों के दौड़ते घोड़े थम गए। बूढ़े ने उसका हाथ पकड़कर कहा-आ चलें।
    “कहां, पिताजी के पास....अमर ने चौंक कर कहा।
    “हाँ, उनके पास ले चलूँगा पर जहाँ तेरे पिता हैं, वह जगह यहां से बहुत दूर है। हमें वहां पहुँचने में थोड़ा समय लगेगा। अब भी सोच ले, नहीं तो अपने घर चला जा माँ के पास।कहकर अमर को घूरा।
    “नहीं, बाबा, मैं तो पिताजी के पास जाऊंगा”-अमर ने दृढ़ स्वर में कहा। माँ का चेहरा एक बार आँखों में कौंधकर खो गया। फिर कानों में आवाज आई-बेटा अमर, मेरे पास चले आओ, मैं तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहा हूं। अमर ने सड़क की ओर देखा जो जंगल में बहुत दूर न जाने कहां चली गई थी। हां, इसी सड़क पर चलकर वह अपने पिता के पास पहुंचेगा।  
                                                             ( आगे और है )
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