-- देवेन्द्र कुमार
क़िस्त === दो ( पृष्ठ 11 से )
अमर
के पिता युद्ध के मोर्चे पर लापता हो गए थे. तब अमर का जन्म नहीं हुआ था. अब वह आठ
वर्ष का हो गया था. पिता के बारे में उसके प्रश्नों का माँ कुसुम के पास कोई उत्तर
नहीं था माँ जो कुछ कहती थी उससे अमर की तसल्ली नहीं होती थी आखिर उसने खुद पिता की
खोज में जाने की सोची. एक रात सोती हुई माँ को छोड़ कर अमर चल दिया.सडक पर जाते कुछ
सैनिकों के पीछे चलते हुए अमर को थकान के कारण नींद आ गई. और जब नींद खुली तो उसका
सामना बांसुरी बाबा से हुआ. बांसुरी बाबा ने अमर को उसके पिता से मिलाने का वादा
किया. भोला अमर उसके साथ चल दिया.अब क्या होने वाला था ! अमर का अनजान सफ़र कहाँ
खत्म होने वाला था?
(
पहली क़िस्त ---- पृष्ठ 1 से 10 ) अब आगे पढ़ें
क़िस्त ==दो
“चल।” कहकर बूढ़े ने अमर का
हाथ पकड़ लिया, फिर उसी तरफ बढ़ चला जिधर से आया था-जंगल में पेड़ों के बीच से
होते हुए दोनों बढ़ चले। बूढ़े ने एक हाथ से अमर की नन्ही कलाई थाम
रखी थी, दूसरे में पकड़ी बाँसुरी को होंठों पर सटाकर एक विचित्र धुन
निकाल रहा था। दूर पेड़ों के पीछे धुआं उठता दिखाई दे रहा था।
ऊबड़-खाबड़ पगडंडी ने अमर को थका दिया। बदन पर खरोंचें लग गईं,
क्योंकि वे जंगल में से बढ़ रहे थे। पेड़ों के आगे शोर सुनाई दे रहा
था। अमर बूढ़े के साथ एक खुली जगह में आ पहुँचा। थोड़ी दूर पर लाल खपरैल
वाले कई मकान थे। उन्हीं मकानों से उठता धुआं देखा था अमर ने। दूर से पता
नहीं चलता था कि उस घने वन में कोई बस्ती भी हो सकती है।
एक तरफ घना वट वृक्ष था। उसकी डालों से लम्बी, पतली शाखाएँ लटकी हुई थीं-कुछ तो जमीन
में भी समा गई थीं।
चारों ओर तेज धूप फैल गई थी, पर वृक्ष के नीचे घनी
छाया थी। बूढ़ा अमर को लेकर छाया में चला गया। पेड़ की जड़ को घेरकर एक टूटा-फूटा
चबूतरा बना हुआ था। बूढ़े ने अपनी पोटली चबूतरे पर रख दी। धूप की तेजी से अमर
की आँखें चौं धिया रही थीं। उसे जोरों की भूख लगी थी। रात को भी उसने
जरा-सा खाया था। और उसके बाद से रात में और आज सुबह से लगातार चलता जा रहा था।
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तब तक कुछ बच्चे उनके सामने आ गए थे और शोर
मचा रहे थे। एक झोंपड़ी के बाहर
एक बूढ़ी औरत ऊखल में कुछ कूट रही थी।
झोंपडि़यों के पीछे दूर खेतों में
दो व्यक्ति हल चलाने में लगे थे। बूढ़ा
बाँसुरी वाला आँखें बन्द करके पेड़
के तने से टिक गया। अमर को लगा जैसे वह
सो गया हो। अमर ने बूढ़े की ओर
देखा.
-उसका
दाढ़ी वाला चेहरा काफी डरावना लगा। तभी
बूढ़े ने आँखें खोलकर अमर को घूरा, फिर कहा-“क्यों थक गया? लेकिन थकने से कैसे चलेगा। मैंने भी कल से कुछ नहीं खाया है। पहले हमें अपने लिए भोजन जुटाना चाहिए।
क्यों, भूख तो तुझे भी लगी होगी।” जवाब में अमर ने सिर
हिला दिया। सचमुच उसे बहुत भूख लगी
थी।
बूढ़ा सीधा बैठ गया। उसने झोले से
बाँसुरी निकाली और होंठों से लगाकर बजाने
लगा। एक मीठी धुन हवा में तैरने लगी। बाँसुरी की आवाज सुन चबूतरे से
थोड़ी दूर खड़े बच्चे उछलने लगे। ऊखल में कुछ कूटती बुढि़या ने काम रोक
दिया और आँचल से हाथ पोंछती हुई वट वृक्ष के निकट चली आई। फिर तो धीरे-धीरे
सभी झोंपडि़यों से औरतें, बच्चे बाहर निकल आए और वट वृक्ष से थोड़ी दूर
घेरा-सा बनाकर खड़े हो गए।
बूढ़ा आँखें बन्द किए बाँसुरी बजाता रहा, फिर गोल-गोल घूमने
लगा, उसी तरह जैसे सुबह अमर ने देखा था उसे। बूढ़ा कुछ
देर बाँसुरी बजाता, फिर सामने खड़ी औरतों,
बच्चों की भीड़ के बीच जाकर
नाचने लगता। काफी देर तक बारी-बारी से इसी तरह करने के बाद बूढ़े ने बाँसुरी
बजाना बन्द कर दिया और अपने झोले से निकालकर एक कटोरा अमर को थमा दिया।
बोला-“जा, इन लोगों के पास जा।”
अमर हाथ में कटोरा लिए खड़ा रह
गया। समझ न सका कि बूढ़ा क्या कह रहा है। उसे चुप खड़ा देख बूढ़े ने आगे की
तरफ धक्का-सा दिया। बोला-“जाता क्यों नहीं,
क्या खाना नहीं खाना है?”
“खाना तो है।” अमर ने धीरे से कहा।
“तो फिर जाता क्यों नहीं। जाकर कटोरा सबके सामने कर दे। बिना मांगे
गाँववाले कुछ देने वाले नहीं.... जो मिल जाए ले आ, फिर आगे चलना है।
आखिर सारा दिन तो यहाँ बैठे नहीं रह सकते।”
बूढ़े ने रूखी आवाज में कहा।
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अब
अमर की समझ में सारी बात आ गई। बूढ़ा चाहता था कि अमर कटोरा लेकर सबके
सामने जाए और.... इससे आगे सोचकर ही उसका मन लज्जित हो उठा। तो बूढ़ा
बाँसुरी बजाकर भीख मांगता था और इस तरह अपना पेट भरता था। वह अमर से भी यही
करने को कह रहा था। अमर कटोरा हाथ में लिए खड़ा रहा। तभी बूढ़े ने पीछे से
पुकारा-“ऐ लड़के..... सो गया क्या।”
अमर जैसे नींद से जागा और कटोरा लेकर वहां खड़ी औरतों,
बच्चों के सामने घूम गया। उसकी आँखें
जमीन में गड़ी हुई थीं। वह महसूस कर रहा था कि कटोरे में कुछ डाला जा रहा है।
भीड़ के सामने से होता हुआ वह बूढ़े की तरफ आने लगा तो देखा, कटोरे में कुछ सिक्के और दो केले पड़े थे।
अमर ने कटोरा पेड़ के नीचे चबूतरे पर रख
दिया और सिर झुकाकर बैठ गया। उसकी भूख जैसे एकदम गायब हो गई थी।
बूढ़े ने एक केला उठाया और खाने लगा।
दूसरा केला कटोरे में पड़ा रहा। एक
केला उठाने के साथ-साथ बूढ़े ने सिक्के
भी जेब में डाल लिए थे। कटोरे में
पड़ा एक केला अमर के पेट में भूख बढ़ा रहा
था, फिर भी उसने केला उठाया
नहीं। उसे लग रहा था, यह भीख है। इसे नहीं
खाना चाहिए। उधर भूख भी जोर से
लग रही थी।
तभी पत्तों में खड़खड़ हुई। एक बन्दर
फुर्ती से नीचे उतरा और कटोरे में रखा केला उठाकर पेड़ पर जा चढ़ा। बूढ़े ने
गुस्से में अमर का कन्धा झिंझोड़ दिया-“यह क्या कमबख्त। न खुद खाया,
न मुझे खाने दिया।” बूढ़े ने अमर का
कन्धा इतनी जोर से पकड़ा था कि दर्द करने लगा। उसने आँसू भरी आँखों से
ऊपर ताका-बन्दर एक डाल पर बैठा मजे से केला खा रहा था-उसने केला खाकर जो
छिलका फेंका तो ठीक कटोरे में आ गिरा। यह देख,
अमर के उदास होंठों पर हँसी
आ गई, बूढ़ा भी जोर से हँस पड़ा। फिर बोला-“इस एक केले से तो कुछ भी नहीं हुआ। कैसे हैं ये गाँववाले।”
एक आवाज आई, “नहीं, बाँसुरी बाबा, गाँववाले वैसे नहीं
हैं जैसा तुम समझ रहे हो। तुम तो हमारे बरान गाँव में पहले भी आ चुके हो।‘’
13
”
“ बाँसुरी बाबा” नाम सुनकर अमर ने
नजरें उठाईं-सामने एक बुढि़या हाथ में
थाली लिए खड़ी थी। उसके होठों पर हँसी
थी। वह एकटक अमर को देख रही थी।
बुढि़या ने हाथ की थाली चबूतरे पर रख
दी। उसमें चार केले, रोटियां, सब्जी
थी। उसने बूढ़े से कहा-“बाँसुरी बाबा, मैं तुम्हें अच्छी
तरह जानती हूं। लो खाओ, इस बच्चे को भी खिलाओ।”
बूढ़े ने खाना शुरू कर दिया, पर अमर अब भी चुप था। पता नहीं मन कैसा हो रहा था। जोरों से भूख लगी
थी, पर मन
नहीं था। बुढि़या कुछ पल अमर को देखती
रही, फिर उसका हाथ पकड़कर
बोली-“बाँसुरी बाबा, मैं इस बच्चे को अपने साथ ले जाती हूं। यह वहीं खा लेगा। तब तक तुम खा लो।”
बूढ़े ने उस औरत को घूरा फिर जोर से सिर हिलाकर बोला-“ऊँ हूँ। यह कहीं नहीं जाएगा। तुम्हें जो खिलाना हो, यहीं ले आओ। हम ज्यादा देर नहीं रुक सकते।” कहकर उसने अमर का हाथ
पकड़ा और खींचकर अपने पास बैठा लिया।
उस औरत की आँखों में अचरज का भाव भर
गया। वह कुछ पल चुपचाप खड़ी रही, फिर धीरे-धीरे वहाँ से चली गई।
बूढ़े ने आँखें सिकोड़कर कहा-“देखो लड़के, इस तरह हर किसी के
साथ जाना ठीक नहीं होता। ये लोग ऐसे ही हैं। न किसी के साथ जाना, न किसी से बात करना ।
नहीं तो तुम अपने पिता के पास नहीं पहुँच
सकोगे।”
अमर को झटका-सा लगा। लेकिन उसने कुछ कहा
नहीं। उसे बाँसुरी बाबा पर गुस्सा आ रहा था,
जो सारा खाना खुद खा गया था।
तभी वह औरत दूसरी थाली में अमर के लिए
भोजन ले आई। मीठे स्वर में बोली-“आओ बेटा, खा लो।”
न जाने क्यों उसकी आवाज में अमर को माँ
के स्वर की झलक मिली। माँ भी तो बिल्कुल
इसी तरह पुकारती है। किसी तरह अपने मन के भावों को रोककर वह
भोजन करने लगा।
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आँखों
में माँ का चेहरा उभर आया। पता नहीं,
माँ ने अब तक भोजन किया होगा या नहीं।
“बाँसुरी बाबा, यह बच्चा कौन है? इससे पहले तुम हमेशा
अकेले ही आए हो। इसे कहाँ ले जा रहे हो?”
औरत ने पूछा।
“मैं ले जा रहा हूं या इसने मुझे बाँध
लिया है।” बूढ़े ने जैसे गुर्राकर
कहा। फिर बताने लगा-“यह बच्चा आज मुझे सडक
पर अकेला खड़ा मिला था। अपने
पिता की तलाश में घर से निकल आया है।
मुझे इस पर तरस आ गया। मैं इसे पिता
के पास ले जा रहा हूं।”
अमर ने कुछ कहना चाहा पर जैसे गला रुंध
गया था।
अमर ने खाना खत्म किया तो औरत बरतन लेकर
चली गई। बाँसुरी बाबा खाने के बाद
पेड़ के नीचे चबूतरे पर लेटकर खर्राटे
भरने लगा था। उसकी दाढ़ी विचित्र
ढंग से फड़फड़ा रही थी। अमर बेहद थका
हुआ था, पर उसे नींद नहीं आ रही थी।
पेड़ पर परिन्दे शोर कर रहे थे। थोड़ी
दूर पर बच्चे उछल-कूद मचा रहे थे। अमर पेड़ की छाया के नीचे से खुले में
निकल आया। पेड़ के नीचे उसे कुछ घबराहट-सी महसूस हो रही थी। तभी उसने देखा-वही
औरत इशारे से अपनी तरफ बुला रही थी। अमर कुछ झिझकता हुआ-सा उसके पास चला
गया।
औरत ने उसका हाथ पकड़कर धीरे से कहा-“बेटा, जो बाँसुरी बाबा ने
कहा, क्या वह सच है?”
“हाँ!”
अमर ने कह दिया।
“क्या तू जानता है तेरे पिता कहाँ हैं?”
“नहीं तो,
मैंने उन्हें देखा ही नहीं है। बाँसुरी
बाबा मुझे वहां तक पहुंचा देगा।” और फिर अमर धीरे-धीरे उसे सारी बात बता गया।
“बेटा,
इस तरह माँ से बिना कहे घर छोड़ना ठीक
नहीं। मेरी मान तो तू अपने घर लौट जा। तेरी माँ बहुत परेशान हो रही होगी।
15
”
“और पिताजी, उन्हें कौन लाएगा? मुझे पता है, वह अपने-आप कभी नहीं
आएंगे? मैं उन्हें साथ लेकर माँ के पास जाऊँगा।” अमर ने एकदम कहा।
“ईश्वर करे तेरी इच्छा पूरी हो। तेरे
पिता तुझे मिल जाएँ। लेकिन.....’’ उस
औरत ने बीच में ही बात रोक दी, फिर बोली-“बेटा, मेरे पास इस समय दो
रुपए हैं। तू रख ले। कभी काम आएँगे।”
और दो का नोट अमर की जेब में डाल दिया।
अमर मना करता रह गया। फिर फुसफुसाई-“अब तू बाँसुरी बाबा के पास चला जा। तुझे नहीं देखेगा तो नाराज
होगा।”
अमर थके कदमों से लौट आया। बाँसुरी बाबा
अभी तक सो रहा था। अमर पेड़ के नीचे जा बैठा।
दोपहर ढल चुकी थी। थोड़ी देर बाद तेज
हवा बहने लगी, वट वृक्ष के पत्तों
में अटककर शोर करने लगीं। पत्तों की
खड-खड़ के बीच परिन्दों की आवाजें भी
गूंज उठती थीं। अब मैदान में कोई नहीं
था। सब लोग झोपडि़यों में जा चुके
थे। अमर और बाँसुरी बाबा पेड़ के नीचे
चबूतरे पर बैठे रहे। समय बीतता रहा।
पश्चिम में सूरज पेड़ों के पीछे चला गया
था। पेड़ के नीचे चबूतरे पर
धुँधलका-सा छा गया। सामने मैदान के छोर
पर बनी झोंपडि़यों में काम करने
की आवाजें आ रही थीं, कहीं-कहीं दीपक जल
उठे थे।
अमर का मन बेचैन हो उठा--- वह
कहाँ चला आया है। अब कहाँ जाना है। यह बाँसुरी बाबा क्या सचमुच मुझे पिताजी के
पास ले जाएगा? इस समय भला माँ क्या कर रही होगी-यही बातें अमर के मन में घूम
रही थीं। “बाबा।” एकाएक अमर बोल उठा।
“हूं।”
बूढ़े ने कहा, फिर बाँसुरी बजाने
लगा। कुछ देर बजाने के बाद रुककर
बोला-“गाँववाले शायद हमें भूल ही गये। अब यहाँ से चल देना चाहिए।”
“कहाँ बाबा?”
“कहीं भी.... लेकिन रात में भी तो भूख
लगेगी.... अब इस गाँव में बाँसुरी बजाकर कुछ मिलनेवाला नहीं....”
16
तभी सामने से लालटेन की हिलती-डुलती रोशनी
उस तरफ आती दिखाई दी। अमर ध्यान
से देखने लगा। इस समय कौन आ रहा था भला? पास आने पर पता चला
कि वही औरत है जो दिन में खाना लेकर आई थी। उसके साथ एक बच्चा भी था। उसके
हाथ में एक थाली थी।
“बाँसुरी बाबा, इस पेड़ के नीचे रात
बिताना ठीक नहीं। यहाँ साँप निकलते हैं। अभी कुछ दिन हुए एक आदमी को साँप
ने काट लिया था।”
साँप का नाम सुनते ही अमर का बदन सिहर
उठा। इधर-उधर झाडि़यों में लगातार चिट्-चिट् घूँ-घूँ की आवाजें हो रही थीं।
पता नहीं कौन-सा जानवर था।
बाँसुरी बाबा उठा तो अमर भी उठ खड़ा
हुआ। ऊपर आकाश में असंख्य तारे नजर आ रहे थे। कुछ चमकीले,
कुछ मद्धिम। अंधेरे में शायद कोई
चमगादड़ उड़ता हुआ निकल गया।
“बाबा,
यहां से थोड़ी दूर पर एक पुराना मन्दिर
है। चाहो तो वहां रात बिता लो। सुबह चले जाना।”
औरत ने कहा।
“रात को मुझे कम दिखता है।” बूढ़ा धीमे स्वर में
बोला। अमर ने उसकी कलाई थाम ली। औरत आगे-आगे लालटेन दिखाती चली। बच्चा साथ था। वह
चुपचाप चल रहा था। ऊबड़-खाबड़ रास्ता पार करके वे लोग एक खंडहर मन्दिर के पास
पहूँ चे। मन्दिर एक टीले पर बना हुआ था। सब तरफ पत्थर बिखरे थे, इधर-उधर
घनी झाडि़याँ थीं।
“यह बहुत पुराना मन्दिर है।” उस औरत ने कहा-“कई सौ साल पुराना। गाँव से दूर होने के कारण यहाँ कोई-कोई आता है। कुछ
दिन हुए गाँव में ही एक नया मन्दिर बन गया है। सब वहीं जाते हैं। एक पुजारी
भी रहता है वहां।”
“हूँ।”
बाँसुरी बाबा के मुँह से विचित्र-सी
आवाज निकली।
बच्चे ने थाली लालटेन के पास रख दी और
अमर की ओर देखने लगा। अमर उसे देखकर
जरा मुसकराया तो बच्चा भी हँस पड़ा, लेकिन बोला अब भी
नहीं।
17
“यह मेरा पोता है। बोल नहीं सकता। इसका
नाम रोहू है। पिछले साल बुखार आया
था,
तब से आवाज को न जाने क्या हो गया।” औरत कह रही थी।
बाँसुरी बाबा ने खाना शुरु कर दिया था। अमर ने भी एक रोटी उठा ली और खाने लगा।
रोहू बड़े ध्यान से अमर की ओर देख रहा था।
दोनों ने खाना खत्म किया तो बच्चे ने थाली उठा ली और औरत ने लालटेन। कुछ पल सोचती रही।-“अंधेरा है इसलिए लालटेन ले जानी पड़ेगी।”
उसने कहा-“नहीं तो छोड़ जाती।”
अमर ने देखा मन्दिर के अन्दर जलता दीपक
बुझने-बुझने को हो रहा था। अंधेरे
में उस सुनसान जंगली स्थान पर रात
बिताने की कल्पना से मन-ही-मन डर गया
अमर,
लेकिन और किया भी क्या जा सकता था। एक
बार मन में आया-‘यह औरत हमें
अपनी झोंपड़ी में भी तो सोने को कह सकती
थी।’
चलते-चलते औरत अमर के पास रुकी, उसके सिर पर हाथ
फिराया, फिर टीले के ढालवाँ रास्ते पर उतर गई। अमर खड़ा-खड़ा
देखता रहा। झाडि़यों के बीच लालटेन की रोशनी हिलती-डुलती हुई दूर जा रही थी।
मन्दिर वाले टीले पर से दूर-दूर तक दिखाई दे रहा था। सब तरफ गहरा अंधेरा
और बीच मैदान में लालटेन की रोशनी, जैसे अंधेरे की नदी की लहरों पर एक दीपक तैर रहा हो।
तभी बाँसुरी बाबा की आवाज सुनाई पड़ी-“ऐ लड़के, कहाँ भाग गया। चल
इधर।”
अमर पीछे चला आया। उसने देखा बाँसुरी
बाबा मन्दिर के बरामदे में अपनी
पोटली का सिरहाना लगाए लेटा था। अमर पास
ही बैठ गया। उसका सिर जैसे घूम रहा
था। सोच रहा था-“बाबा मुझे पिताजी के
पास कब ले जाएंगे।“ तभी वातावरण में
एक चीख गूँज उठी। “बच्चे की आवाज।” कहता हुआ
बूढ़ा झटके से उठा और गाँव की
ओर देखने लगा।
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3. रोहू का क्या होगा
अमर
भी उठा। उसने देखा-मन्दिर से थोड़ी दूर लालटेन के प्रकाश में जैसे कुछ हिल रहा है।
“मैं
देखता हूं क्या गड़बड़ है।” कहकर बूढ़ा आगे की
तरफ दौड़ पड़ा। अमर भी साथ-साथ भागने लगा। तलवों में कंकड़ और बदन पर झाडि़यों के
काँटे चुभ रहे थे, पर दोनों दौड़ते रहे।
थोड़ा आगे झाडि़यों के बीच रोहू जमीन पर पड़ा दिखाई दिया। उसके मुँह से अजीब-सी आवाज निकल रही
थी। उसकी दादी पास में ही खड़ी थी।
इन दोनों को देखते ही वह चीखकर बोली-“इसे साँप ने काट लिया
बाँसुरी बाबा! अब क्या होगा? अब क्या होगा मेरे रोहू का?”
बाँसुरी बाबा झुककर बैठ गया। रोहू के
टखने के पास खून निकल रहा था। बाबा
ने अपने लबादे से घाव के आस-पास की जगह
साफ की, फिर झुककर होंठों से उस जगह को चूसने लगा।
अमर भी झुककर पास में बैठ गया। लालटेन
की पीली रोशनी में रोहू के पैर से मुँह लगाकर चूसता हुआ बाँसुरी बाबा विचित्र लगा
अमर को।
कुछ देर बाद बाँसुरी बाबा ने मुंह परे
करके थूक दिया, फिर से घाव पर मुँह
लगाकर चूसने लगा। वह क्रिया कई बार
दोहराई उसने। रोहू की दादी किसी मूर्ति
की तरह पास खड़ी थी। उसके हाथ की लालटेन
रह-रहकर हिल उठती थी। लगता था कि
उसका बदन काँप रहा है।
बीच-बीच में बाँसुरी बाबा रोहू के चेहरे की ओर भी देख लेता था। रोहू की आँखें बन्द थीं। उसके होंठ हिल
रहे थे, पर कोई आवाज बाहर नहीं आ रही थी।
19
तभी बाँसुरी बाबा ने रोहू को गोदी में उठा लिया और बोला-“इसे घर ले चलो। मुझे लगता है,
इसे इलाज के लिए शहर ले जाना पड़ेगा।”
आगे-आगे रोहू की दादी लालटेन की रोशनी
दिखाती हुई चल रही थी। पीछे बाँसुरी बाबा था रोहू को गोद में उठाए हुए। बाबा से
सटकर अमर चल रहा था।
“रोहू को साँप ने काट लिया। रोहू को साँप
ने काट लिया।” झोंपडि़यों के सामने पहुँचकर वह चिल्लाई। तुरन्त झोंपडि़यो में
हलचल हुई। दरवाजे खुले और जोर-जोर से बोलते हुए स्त्री-पुरूष बाहर निकले।
सब पूछ रहे थे-“कैसे, क्या हो गया।”
एकाएक बाँसुरी बाबा ने कहा-“अभी कोई सवाल-जवाब
नहीं। तुरन्त बैलगाड़ी तैयार करो।बच्चे
को शहर के अस्पताल में ले जाना होगा, नहीं तो इसके प्राण
नहीं बचेंगे। इस बीच मैं अपनी दवा देता हूँ। मैंने दिन में आते हुए जंगल में
सर्प विष उतारने
की एक जड़ी देखी थी। उसे ढूँढकर लाता
हूँ।“
कहकर बाँसुरी बाबा ने लालटेन उठाई और जंगल की तरफ दौड़ा।
अमर कुछ कह पाता, इससे पहले ही बाबा वहां से जा चुका था। अमर देखता रहा। झाडि़यों में
लालटेन की रोशनी हिलती दिखाई दे रही थी। बाँसुरी बाबा वहां साँप का विष उतारने
वाली जड़ी ढूंढ़ रहा था।
अमर जमीन पर रोहू के पास बैठ गया। रोहू
की दादी पास खड़ी रो रही थी। वह कह रही थी-“मैंने इसे कितना मना
किया था कि मेरे साथ मत चल पर यह नहीं माना। हे मेरे भगवान।”
अमर का मन गहरे दुख से भर उठा। वह सोच रहा था-अगर रोहू की दादी अँधेरे में मन्दिर
न आती तो रोहू को साँप कभी न काटता। वह इसके लिए अपने को और बाँसुरी बाबा को दोषी
मान रहा था। बूढ़े को अंधेरे में जड़ी तलाशते देखकर मन में आया-अगर
किसी साँप ने बाबा को भी काट लिया तो...तो.... पर वह इससे आगे नहीं सोच सका। ( आगे और है)
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