शुक्रवार, 6 मई 2016

एक छोटी बांसुरी




तीसरी क़िस्त -- पृष्ठ २१ से पढ़ें ( दूसरी क़िस्त पृष्ठ ११ से २० )

लापता पिता की खोज में सोती हुई माँ को पीछे छोड़ कर आठ बरस का अमर चुपचाप घर से निकल पड़ा. रास्ते में उसे एक बूढा मिला. उसने अमर को भरोसा दिया कि  वह उसके पिता का ठिकाना जानता है.उसने अमर को उसके पिता से मिलाने का वादा किया. भोला अमर बूढ़े के साथ  चल दिया. लेकिन बूढ़े बांसुरी वाले ने उसे धोखा दिया. वह भिखारी था. वह अमर को एक गाँव में ले गया. रात में एक औरत उन्हें खाना देने आई . उसके साथ उसका गूंगा पोता रोहू था. रोहू को सांप ने काट लिया. बूढ़े ने रोहू के घाव से विष चूसा फिर ...( अब आगे पढ़ें )

 थोड़ी देर में बाँसुरी बाबा हाथ में कुछ पत्ते लिए दौड़ा हुआ आया। उसने जल्दी-जल्दी पत्तों को रगड़ा और घाव पर लगा दिया। रह-रहकर किसी जड़ी का रस वह रोहू के मुंह में टपका देता था।
    तभी दो आदमी बैलगाड़ी तैयार करके वहाँ ले आए। बैलगाड़ी के पीछे की तरफ एक लालटेन लटकी हुई थी, उसकी मद्धिम रोशनी फैल रही थी। एक आदमी बैलों की रस्सी थामे खड़ा रहा। तीन जनों ने रोहू को बैलगाड़ी के टप्पर के अन्दर बिछे पुआल पर लिटा दिया।    
    इसके बाद चुप्पी छा गई। शायद गाँववाले यह तय नहीं कर पा रहे थे कि रोहू के साथ कौन-कौन शहर जाए। बाँसुरी बाबा फुर्ती से टप्पर के नीचे जा बैठा, फिर अमर से बोला-छोकरे, वहाँ खड़ा-खड़ा क्या सोच रहा है। क्या चलना नहीं है?”
    अमर जैसे नींद से जागा हो, इस तरह चौंका, फिर पुआल पर बेसुध पड़े रोहू के पास जा बैठा। इसके बाद और भी कई लोग बैलगाड़ी के अन्दर आ गए। उनमें रोहू की दादी भी थी।
बैलगाड़ी हिलती-डुलती आगे बढ़ी। तभी बाँसुरी बाबा ने कहा-जरा पुराने मन्दिर की तरफ से चलना। हमारा सामान तो वहीं रखा है। कौन जाने बाद में कब आना हो,’  
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    अब अमर को भी याद आ गया। रोहू की चीख सुनकर बाँसुरी बाबा एकदम ही तो दौड़ पड़ा था। बैलगाड़ी ऊबड़-खाबड़ रास्ते पर हिचकोले खाती हुई बढ़ रही थी। रह-रहकर अमर का सिर टप्पर के डंडे से टकरा जाता। अपने को गिरने से बचाने के लिए अमर ने बैलगाड़ी के छाजन से लटकती रस्सी थाम ली और संभलकर बैठ गया।
    टीले के पास बैलगाड़ी रुकी तो बाँसुरी बाबा ने अमर से कहा-छोकरे, जल्दी से जाकर मेरी पोटली उठा ला। तेरा कुछ सामान हो तो उसे भी ले आना।फिर जैसे कुछ याद आ जाए, इस तरह बोला-अरे, तेरे पास तो कुछ भी नहीं है। जा, जल्दी से मेरी पोटली उठा ला।
    अमर ने सहमी नजरों से टीले पर बने मन्दिर की ओर देखा। अब वहां घुप्प अँधेरा था। शायद मन्दिर के अन्दर जलता दीपक बुझ चुका था। उसको अपने बदन पर कुछ रेंगता हुआ महसूस हुआ। उस अँधेरे में बैलगाड़ी से नीचे उतरकर टीले पर जाना और मन्दिर में रखी बाँसुरी बाबा की पोटली उठाकर लाना, अमर को बहुत कठिन काम लग रहा था।
    “जाता क्यों नहीं।बाँसुरी बाबा चिल्लाया। अब अमर बैठा नहीं रह सका। वह सहमता-सा बैलगाड़ी से नीचे कूद पड़ा और मन्दिर वाले टीले पर चढ़ने लगा। धुँधले आकाश की पृष्ठ भूमि में मन्दिर एक गहरी काली छाया जैसा लग रहा था। अमर की समझ में नहीं आ रहा था कि उस घने अँधेरे में वह बाँसुरी बाबा की पोटली कैसे ढूँढ़ेगा। फिर भी उसे मन्दिर में जाना ही था- बाँसुरी बाबा की कड़ी आवाज अब भी उसके कानों में गूँज रही थी।
    वह टीले की आधी ऊँचाई तक चढ़ चुका था तभी पीछे रोशनी दिखाई दी जो धीरे-धीरे पास आती जा रही थी। अमर को ताज्जुब हुआ कि इस समय और दूसरा कौन आ रहा है टीले पर। वह रुक गया और मुड़कर देखने लगा। रोहू की दादी हाथ में लालटेन लिए हुए बढ़ी आ रही थी। अमर को रुका देख उसने कहा-बेटा, मैं लालटेन ले आई। सोचा, तू अँधेरे में पोटली कैसे ढूंढ़ेगा।
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    अमर ने कहा-लेकिन अम्मा, आपको रोहू के पास रहना चाहिए था। वह कितना बीमार है।
    रोहू की दादी ने अमर की कलाई थाम ली। अमर को लगा जैसे उनकी उँगलियां काँप रही हों। दादी ने कहा-हाँ बेटा, पर तू भी तो रोहू जैसा है मेरे लिए। अँधेरे में साँप-बिच्छू निकलते हैं यहां। इसीलिए लालटेन लेकर चली आई।कहते-कहते रोहू की दादी की आँखों में आँसू चमक उठे।
    लालटेन की रोशनी में बाँसुरी बाबा की पोटली ढूंढ़ने में दिक्कत नहीं हुई। पोटली यूँ ही एक तरफ पड़ी थी। उसे खोलने का मौका ही नहीं मिला था। अमर  ने  पोटली  उठा  ली।  तब  तक लालटेन बाहर छोड़कर रोहू की दादी मन्दिर के अन्दर चली गई थी।
    अमर ने मूर्ति के पास से आती रोने की आवाज सुनी। उसने एक हाथ में पोटली लटका ली, दूसरे से लालटेन उठाकर मन्दिर के अन्दर चला गया। रोहू की दादी आँखें मूँदे प्रार्थना कर रही थी। रोशनी में आँखों से बहते आँसू झलमला उठे। अमर के मन्दिर में पहुँचते ही वह आंसू पोंछकर उठ खड़ी हुई। फिर अमर का हाथ पकड़कर मन्दिर से बाहर निकल आई। टीले से उतरते-उतरते अमर ने पीछे मुड़कर देखा, तभी कानों में आवाज आई-छोकरे।बाँसुरी बाबा चिल्ला रहा था। अमर के कदमों में तेजी आ गई। उसने पोटली बैलगाड़ी के अन्दर रख दी, फिर खुद भी चढ़ गया। रोहू की दादी भी एक तरफ बैठ गई।
    मन्दिर वाले टीले को पीछे छोड़ती हुई बैलगाड़ी बढ़ चली। पुआल पर पड़ा रोहू धीरे-धीरे कराह रहा था।
बैलगाड़ी चली जा रही थी। सब तरफ सन्नाटा और अँधेरा। हर चीज जैसे अँधेरे में खो गई थी। बैलगाड़ी के पहियों के साथ अमर का मन भी भाग रहा था। एकाएक कानों में बाँसुरी का सुर आया। बाँसुरी बाबा जोर-जोर से बाँसुरी बजा रहा था।
    “बाबा।अमर के रुँधे गले से निकला। वह सोच रहा था, यह क्या बाँसुरी बजाने का समय है। कोई सो न जाए इसीलिए बाँसुरी बजा रहा हूँ।बाबा ने कहा।
    अमर बैलगाड़ी में एक तरफ सिर टिकाकर बैठा था। फिर न जाने कब नींद ने उसे अपनी गोद में ले लिया। रह-रहकर बाँसुरी का सुर कानों में चुभता रहा।
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4.    उसके लिए

एकाएक झटका लगा और अमर की नींद खुल गई। यह समझने में उसे थोड़ा समय लगा कि वह कहाँ  है, फिर सब याद आ गया। वह हड़बड़ाकर उठ बैठा।
    बैलगाड़ी रुकी हुई थी, उसके कानों मे बातचीत की आवाजें आ रही थीं। बैलगाड़ी के छाजन से लटकी लालटेन बहुत मद्धिम रोशनी फेंक रही थी। फिर भी इतना देखा जा सकता था कि वह पुआल पर अकेला पड़ा था। बाकी सब कहाँ गए? रोहू, बाँसुरी बाबा, रोहू की दादी और बाकी सब? अमर बैलगाड़ी से नीचे कूद गया। इधर-उधर देखा। बैलगाड़ी एक बड़ी-सी इमारत के पास रुकी हुई थी। अभी दिन पूरी तरह नहीं उगा था। आसमान में तारे फीके पड़ गए थे।
    तभी बाँसुरी बाबा की आवाज आई, “छोकरे, खुल गई नींद?”
    “बाबा, रोहू कैसा है?” उसने पूछा।
    “यह अस्पताल है। रोहू को अन्दर ले गए हैं। मुझे उम्मीद है वह ठीक हो जाएगा, अब हम चलें।
    “कहां।
    बाँसुरी बाबा जोर से हँसा। रोहू को साँप ने काटा था, उसका इलाज हो रहा है। अब यहाँ हमारा क्या काम। कहीं और ठिकाना देखते हैं, कुछ खाने-पीने का इन्तजाम भी तो करना है। इन लोगों के साथ कब तक रहेंगे? उन्हें अपना काम करने दो।
    अमर अनमने भाव से देखता रहा। उसे माँ की याद आ रही थी। घर से निकले दो दिन बीत गए थे। उसे अब तक यह पता नहीं था कि वे कहाँ जा रहे हैं? बात उसके होठों तक आकर रह गई। वह पूछना चाहता था, ‘बाँसुरी बाबा, मुझे पिताजी के पास कब ले चलोगे?’ पर वह चुप रह गया। तभी उसने रोहू की दादी को देखा। वह अस्पताल के दरवाजे से निकलकर उसकी ओर बढ़ीं। चेहरा उदास था।
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    “क्या बात है?” बाँसुरी बाबा ने पूछा।
    “डाक्टर रोहू को देख रहा है। वह कहता है, हमने आने में देर कर दी, फिर भी वह कोशिश करेगा।
    “क्या मैं रोहू को देख सकता हूँ?” अमर ने कहा।
    “डाक्टर ने सबको बाहर भेज दिया है।
    “अच्छा माई, अब हम चलते हैं। थोड़ी देर में फिर आएँगे।बाँसुरी बाबा ने कहा और अमर का हाथ थाम लिया। अमर समझ न पाया कि वे लोग कहाँ जा रहे हैं। उसका मन था कि जब तक रोहू ठीक न हो जाए, वह वहीं रहे, पर बाबा चलने को कह रहा था।
    रोहू की दादी चुप खड़ी देखती रही। बाँसुरी बाबा अमर का हाथ पकड़कर ले चला। आगे बाजार था, लेकिन अभी दुकानें खुली नहीं थीं। दूर एक जगह धुआं उठता दिखाई दिया। वह एक चाय की दुकान थे। दो आदमी बैठे चाय पी रहे थे।
    बाँसुरी बाबा ने अमर को वहीं रुकने का इशारा किया और चाय की दुकान के सामने जमीन पर बैठ गया। बाँसुरी होंठों से लगाकर बजाने लगा। इसी तरह कुछ देर बाँसुरी बजाने के बाद उठा और गोल-गोल घूमने लगा।
    चायवाले ने बूढ़े की तरफ देखा, फिर मुँह सिकोड़कर बोला, “ऐ बूढ़े, यह सुबह-सुबह क्या राग लेकर बैठ गए.... अभी अभी तो दुकान खोली है, बाद में आना।कहकर अपने काम में जुट गया।
 बाँसुरी बाबा ने हँसकर चाय वाले की ओर देखा। बोला-हम बरान गाँव से आए हैं। सारी रात चलते रहे हैं। इस लड़के के छोटे भाई को साँप ने काट लिया। उसे अस्पताल में छोड़कर आया हूं। बहुत थक गए हैं। इस समय तो बाँसुरी बजाकर उस बच्चे के लिए और तुम्हारे लिए भगवान से आशीर्वाद माँग रहा हूं।”   
बूढ़ा रोहू को उसका भाई बता रहा था, यह सुनकर अमर उसकी सूरत देखता रह गया। उसकी समझ में न आया कि यह सब झूठ कहने की क्या जरूरत थी....लेकिन तभी रोहू की दादी के शब्द कानों में गूंज उठे, जो उन्होंने रात को मन्दिर वाले टीले पर उसे रोशनी दिखाते हुए कहे थे-तू भी तो रोहू जैसा है।क्या सचमुच रोहू उसका अपना भाई जैसा नहीं है?
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बूढ़े की बात सुनकर चाय पीते दोनों लोग उठकर पास आ गए। वे पूछ रहे थे बच्चे को साँप ने कैसे काट लिया था। बीच में ही उन्होंने चाय वाले से कहा-इन दोनों को चाय और कुछ खाने को दो।उनमें एक ने जेब से बटुआ निकाल कर चाय वाले को पैसे दिए फिर दस-दस के कई नोट बाँसुरी बाबा के हाथ पर रखकर बोला-इनसे बच्चे का इलाज कराना। बच्चा जरूर अच्छा हो जाएगा।
बाँसुरी बाबा ने हाथ उठाकर दोनों को आशीर्वाद दिया, फिर उस व्यक्ति के पैर छूने के लिए नीचे की तरफ झुकने लगा तो वह हड़बड़ा कर पीछे हटा-अरे, अरे, यह क्या...यह क्या....उसने बाँसुरी बाबा के कन्धे थाम लिए।
इसके बाद वे दोनों चले गए। चाय वाले ने बाँसुरी बाबा और अमर को चाय और बिस्किट खाने को दिए। इतनी थकान के बाद गरमागरम चाय अमर को अच्छी लगी। चाय पीकर खड़ा हुआ तो बाँसुरी बाबा ने कहा-चाय वाले भाई, अस्पताल में पड़े बच्चे के लिए भी कुछ खाने को दो। और भी कई जने हैं। वे सब बहुत परेशान हैं। ईश्वर तुम्हारा भला करेगा।”   
चाय वाला कुछ सोचता-सा खड़ा रहा, फिर उसने कई बिस्किट उठाकर बूढ़े के कटोरे में डाल दिए। अब बूढ़े ने अमर से आगे चलने का इशारा किया।            
बाबा, मुझे पिताजी के पास कब ले चलोगे?”अमर ने हिम्मत करके पूछ ही लिया।     
एक बार कह दिया न, ले चलूँगा। मुझे पता है तेरे पिता कहाँ हैं-मेरे अलावा कोई तुझे वहाँ नहीं ले जा सकता।बूढ़े ने गुर्राकर कहा और फिर बाँसुरी बजाता हुआ सड़क पर चलने लगा।
अमर सहमा-सहमा साथ चलता रहा। फिर बोला-बाबा, हम अस्पताल चलें। उन लोगों के लिए कुछ खाने को....
बाँसुरी बाबा ने घूरकर अमर की ओर देखा। फिर बोला-उन्हें अपना काम करने दो, हमें अब अपने बारे में भी सोचना चाहिए। क्या तू भूल गया कि तुझे अपने पिता के पास भी जाना है।
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अमर को जैसे जोर का झटका लगा। वह कैसे भूल सकता था यह बात! हर पल उसके दिमाग में एक ही बात तो घूमती रहती थी, पर उसने कहा कुछ नहीं, बाँसुरी बाबा के साथ-साथ बढ़ चला।
बाजारों में चहल-पहल हो गई थी। दुकानें खुलने लगी थीं। एक ऊँचे चबूतरे पर खड़ा होकर बूढ़ा बाँसुरी बजाने लगा। जल्दी ही कुछ लोग जमा हो गए। बूढ़े के इशारे पर अमर कटोरा लेकर चारों ओर घूम गया। बूढ़े के शब्द उसके कानों में चुभ रहे थे-माई बाप, मैं बहुत मुसीबत में हूँ। इस लड़के के भाई को साँप ने काट लिया, वह अस्पताल  में है। मदद कीजिए....मदद...”   
कई बाजारों में यह घटना बार-बार दोहराई गई। लोगों ने पैसे दिए, खाने की सामग्री भी दी। दोपहर हो गई तो एक पेड़ के नीचे बैठकर बूढ़ा खाने लगा, उसने अमर को भी दिया।
बाबा, हमें एक बार रोहू को देखने चलना चाहिए। न जाने उसकी क्या हालत हो।अमर ने कहा.
बूढ़ा खाते-खाते गुर्राया। फिर बोला-मैंने कहा न, उन्हें अपना काम करने दो।
अमर को गुस्सा आ गया। वह सोच रहा था-अगर ऐसा था तो फिर रोहू की बीमारी का नाम लेकर पैसे क्यों माँगे? झूठ क्यों बोला।पर वह कुछ कह नहीं सका।
थोड़ी देर आराम करने के बाद बाँसुरी बाबा उठ खड़ा हुआ, बोला-आओ, अब चलते हैं।
सड़क का मोड़ घूमते ही अमर चौंक उठा। सामने अस्पताल की इमारत दिखाई दे रही थी।
बाबा।अमर का गला रुँध गया।
बाँसुरी बाबा हँस पड़ा, बोला-हाँ, हमें यहीं तो आना था, पर खाली हाथ कैसे आते? इसीलिए बाजारों में इतना घूमना पड़ा। तू पता नहीं क्या-क्या सोच रहा होगा मेरे बारे में।
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अमर अचरज से बाँसुरी बाबा की ओर देखने लगा। कुछ देर पहले और अब की बात में कितना फर्क था? रोहू की दादी तथा दूसरे लोग अस्पताल के बाहर बैलगाड़ी के पास बैठे थे। इन दोनों को देखते ही वे लोग उठ खड़े हुए।
बच्चा कैसा है?” बाँसुरी बाबा ने पूछा।
पहले से तो ठीक है, लेकिन...कहती-कहती रोहू की दादी रुक गई। वह अमर की ओर देख रही थी।
मैं समझ गया.....सारी बात समझ गया।बाँसुरी बाबा ने कहा-फिर जमीन पर बैठकर पोटली खोल डाली। उसमें से नोट और ढेर सारे सिक्के निकाले। रोहू की दादी से बोला-बस, इतने ही हैं। ले लो। इनसे रोहू के लिए दवाई ले आना।
बाँसुरी बाबा, यह क्या?” रोहू की दादी फटी-फटी आँखों से कभी बूढ़े की ओर तो कभी नोटों और रेजगारी की ओर देखने लगी।
नहीं लोगी। कैसे ले सकती हो? मैं तो तुम्हारी बस्ती में आकर भीख मांगता हूं।    एक भिखारी भला किसी को क्या दे सकता है! यही सोच रही हो।बाँसुरी बाबा ने कहा। अमर को लगा जैसे उसकी आवाज कुछ-कुछ काँप रही थी....
यही न कि फिर हम क्या करेंगे! अरे, यह बाँसुरी किसलिए है। जरूरत होगी तो बाँसुरी बजाकर पेट भर लेंगे। हो सकता है पहले की तरह तुम्हारे गाँव में आ जाऊँ किसी दिन.....कहकर बाँसुरी बाबा जोर से हँस पड़ा, फिर नोट और रेजगारी उठाकर रोहू की दादी के हाथ में थमा  दिए।
बोला-भगवान् का नाम लो, रोहू जरूर ठीक हो जाएगा। मैं उससे मिलने आऊँगा गाँव में...
इसे भी अपने साथ लाना।रोहू की दादी बोली।
कौन जाने.... क्या पता....बाँसुरी बाबा ने कहा। फिर अमर को चलने का इशारा करके आगे बढ़ गया।
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अमर को दादी के दिए दो के नोट की याद आई। उसने नोट निकाला और रोहू की दादी की तरफ देखने लगा। वह जल्दी-जल्दी पलकें झपका रही थी, जैसे बाहर बहते आँसुओं को रोकना चाहती हो। होंठ फड़क रहे थे। बोली-तू भी देगा, ला दे... जरूर लूंगी।कहकर दादी ने अमर की मुट्ठी में दबा दो रुपये का नोट ले लिया। झुककर उसकी कमर थपथपा दी। अमर कुछ कहता, इससे पहले ही बाँसुरी बाबा की आवाज सुनाई दी-छोकरे।
अमर ने रोहू की दादी की ओर देखा-एक बार नजर अस्पताल की इमारत पर टिकी, उसका मन था कि अन्दर जाकर रोहू से एक बार मिल ले। जाने वह कैसा है लेकिन....
छोकरे।बाँसुरी बाबा इस बार तेज आवाज में चिल्लाया था। अमर तेज कदमों से आगे भाग चला। एक बार जरा गर्दन घुमाकर ताका था-रोहू की दादी उसी की तरफ देख रही थी। अमर के कदम आगे जा रहे थे लेकिन मन तो कहीं पीछे छूट गया था।

5.    रात में जो हुआ

गलियों-बाजारों में घूमते कई दिन बीत गए थे। अमर को ठीक-ठीक याद नहीं था कि कितने दिन हुए थे। बीच में उसने जब-जब बाँसुरी बाबा से पिता की खोज में जाने की बात कही तो उसने भरोसा दिलाया। कहा-हम उन्हीं के पास तो चल रहे हैं, जल्दी ही पहुँचने वाले हैं तुम्हारे पिताजी के पास।अमर का मन आशा –निराशा  के झूले में झूलता रहता था। कभी लगता था कि बाँसुरी बाबा सचमुच उसे पिता के पास ले जाएगा। फिर मन में आता कि बाँसुरी बाबा उससे झूठ कह रहा है। और तब उसकी निराशा बहुत बढ़ जाती।
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    हर दिन ऐसे ही बीत रहा था-बस्ती और बाजारों में जगह-जगह रुक कर बूढ़ा बाँसुरी बजाता। कहीं कुछ मिल जाता, तो कहीं उन्हें खाली कटोरा लेकर ही चल देना पड़ता। रात किसी पेड़ के नीचे, कहीं फुटपाथ पर, खुले मैदान में नंगी जमीन पर बितानी पड़ती।
    बाँसुरी बाबा कभी-कभी दिन भर नाराज रहता। बिना बात अमर को डाँट देता। बीच-बीच में कहता-छोकरे, तू बाँसुरी बजाना नहीं सीख सका अब तक। क्यों नहीं सीखी भला। तू बाँसुरी बजाना सीख जाए तो मेरी तबीयत खराब होने पर भूखों रहने की परेशानी नहीं उठानी पड़ेगी। बोल, सीखेगा बाँसुरी बजाना?”   
    अमर ने सिर हिलाकर हाँ कह दी थी। बूढ़े ने उसके लिए एक छोटी बाँसुरी खरीद दी। जब भी कहीं आराम करने बैठते, अमर बाँसुरी बजाने की कोशिश करता। बूढ़ा बताता-बाँसुरी के छेदों पर इस तरह उँगलियां टिकाओ, इस तरह बजाओ।कुछ ही दिनों में अमर बाँसुरी बजाना सीख गया था। जब भी मौका मिलता, अमर बैठा-बैठा बाँसुरी बजाने का अभ्यास करता रहता। उसे बाँसुरी बजाते देख, बूढ़ा सन्तोष  से सिर हिलाता कहता-हाँ, इसी तरह करते रहो।”   
    उस दिन मौसम खराब था। सुबह से ही बादल छाए हुए थे। रुक-रुककर बारिश  होती रही। ठंडी हवा चल रही थी। मौसम बदलने लगा था। बाँसुरी बाबा को रह-रहकर खाँसी उठती थी, इसलिए वह ठीक से बाँसुरी नहीं बजा पाता था। वे दोनों सारा दिन बाजारों में घूमे पर उस दिन कहीं कुछ न मिला-न खाने को और न पैसे। अमर का कटोरा खाली रहा।
    शाम ढल रही थी, फिर बारिश होने लगी। उस समय बाँसुरी बाबा और अमर एक सड़क से गुजर रहे थे। सड़क पर ऐसे पेड़ भी नहीं थे, जिनके नीचे खड़े होकर बारिश  से बचा जा सकता। सड़क के एक छोर पर एक पीली-सी इमारत दिखाई दे रही थी। अमर का हाथ थामकर बाँसुरी बाबा उसी तरफ बढ़ चला। लेकिन वहाँ तक पहुँचते-पहुँचते दोनों ही भीग गए।                          ( आगे और है )
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