क़िस्त – चार
अमर अपने लापता पिता की खोज में माँ को
बिना बताए निकल पड़ा. बांसुरी बजा कर भीख मांगने वाले बूढ़े ने उसे बहका कर साथ ले
लिया. दोनों एक गाँव में पहुंचे. एक औरत रात मैं उन्हें
खाना देने आई. साथ में गूंगा रोहू भी था. लौटते समय रोहू को सांप ने काट लिया. बांसुरी
बाबा ने घाव से विष चूसा, फिर रोहू को अस्पताल ले जाया गया. शहर में बांसुरी बाबा
ने रोहू को अमर का भाई बता कर उसके इलाज के लिए मदद मांगी और फिर सारे पैसे रोहू
के इलाज के लिए दे दिए. बांसुरी बाबा के दो रूप देख कर अमर चकित था. दोनों आगे चले
पर बारिश में भीग गए
.
( अब
चौथी क़िस्त में आगे पढ़ें)
वह इमारत एक सराय की थी। सराय के बाहर मैदान में कई गाडि़यां खड़ी थीं। दो घोड़े एक तरफ
बँधे हुए थे। सराय का बड़ा दरवाजा खुला था। कई आदमी अन्दर-बाहर आ-जा रहे
थे।
बाँसुरी बाबा ने अपनी पोटली जमीन पर रख
दी, फिर खुद भी पास में बैठ गया। अमर खड़ा-खड़ा
इधर-उधर देखता रहा। उसे भीगे कपड़ों में ठंड लग रही थी। सराय की रसोई शायद कहीं
पास ही थी, क्योंकि हवा के साथ भोजन की सुगंध आ रही थी। उससे अमर की भूख एकदम बढ़ गई।
बूढ़े ने बाँसुरी होंठों से
लगाई, पर बजाते ही खाँसने लगा। बाँसुरी उसके हाथ से गिर गई। अमर बूढ़े की पीठ सहलाने लगा। बूढ़े की खाँसी जरा थमी तो
भर्राई आवाज में बोला-“बजा....बजा... नहीं तो भूखों रहना पड़ेगा। हो सकता है कुछ मिल जाए।”
अमर ने बाँसुरी उठाकर होंठों से लगा ली-एक मीठी धुन
उभरने लगी। बूढ़े ने एक बार बाँसुरी बजाते
अमर को देखा फिर आँखें मूंदकर
पोटली के सहारे लेट गया। शाम ढल चुकी थी,
आकाश से अँधेरा उतरने लगा। सराय के अन्दर रोशनी थी,
चहल पहल थी-पर बाहर सन्नाटा हो चला था।
अमर काफी देर तक बाँसुरी बजाता रहा,
पर कोई नहीं आया।
एकाएक बूढ़ा बोल उठा-“रहने दे, बन्द कर बाँसुरी। अब
कोई नहीं आएगा। सब अन्दर मजे से खा पी रहे हैं। वे हमारी पुकार सुनने वाले नहीं।”
तभी कदमो की आहट हुई। एक
लम्बा व्यक्ति हाथ में लाठी थामे सराय के अन्दर से निकला और दरवाजे के
सामने खड़ा हो गया। कुछ देर अमर को बाँसुरी बजाते देखता रहा, फिर जोर से बोला-“चलो भागो। यहाँ तुम
लोगों को कुछ मिलने वाला नहीं।”
बूढ़ा बोला -“सुबह से कुछ नहीं खाया है। यह बच्चा भूखा है।”
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“तो मैं क्या करूँ। इस सराय में तुम जैसे
भिखारियों के लिए कोई जगह नहीं
है। पैसे हों तो अन्दर चले जाओ, सब कुछ मिल जाएगा।” फिर सराय के दरवाजे
के सामने लाठी को टेढ़ी करके उसके सहारे टिक गया। जैसे कह रहा हो, अन्दर जाने की कोशिश करोगे तो लाठी से खबर लूंगा।
अमर ने बाँसुरी बजाना बन्द कर दिया।
उसने जान लिया कि आज रात भूखा ही रहना पड़ेगा।
थोड़ी देर में हवा तेज हो गई। अमर का
बदन सिहर उठा। लम्बे आदमी ने सराय का
दरवाजा बन्द किया और अन्दर चला गया। अमर
चुप बैठा इधर-उधर देखता रहा।
एकाएक लगा जैसे किसी ने नाम लेकर पुकारा
हो-“अमर बेटा, मेरे पास आते क्यों
नहीं। मैं कब से तुम्हारी राह देख रहा
हूँ।‘
अमर ने बूढ़े की ओर देखा जो पोटली का सिरहाना लगाए चुप लेटा था। अमर होठों में
बुदबुदाया, “मैं क्या करूं। यह बूढ़े बाबा हर दिन बहाना बना देते हैं। मैं तो
रास्ता जानता नहीं जो अकेला आ सकूँ।”
फिर माँ का चेहरा आँखों के सामने तैर
गया। कितनी परेशान होगी माँ. उनसे से पूछकर आना चाहिए था। लेकिन माँ क्या
अकेला आने देती। ऊँ हूँ कभी नहीं.....
बिल्कुल नहीं।
“मैं पिता को साथ लेकर ही माँ के पास जाऊँगा।”
अमर ने जैसे स्वयं से कहा। तभी सामने से
रोशनियाँ दिखाई दीं।
एक गाडी सराय के दरवाजे पर आकर रुकी।
उसमें से दो आदमी और दो महिलाएँ बाहर आए। उनके साथ बच्चे भी थे। एक
आदमी सामान उतारने लगा। कई सन्दूक,
कई पोटलियाँ।
सराय का दरवाजा खुल गया। दरवाजे के
सामने रोशनी हो गई। वही लाठीवाला लम्बा
आदमी सराय से बाहर आया। अमर ने उसकी
आवाज सुनी-“आइए सेठ जी, आइए अन्दर
आइए। आप लोग लम्बे सफर से थक गए होंगे।” फिर वे लोग अन्दर चले
गए। सराय का दरवाजा दोबारा बन्द हो गया था। अन्दर बरतनों की झनटन सुनाई दे रही थी,
फिर मसालों की खुशबू हवा में तैरने लगी।
अमर जान गया कि अभी जो मेहमान आए हैं उनके लिए गरमागरम खाना बनाया जा
रहा है। सेठ लोगों से सरायवाला कैसी मीठी आवाज में बोला था, और उन लोगों को कैसे
बुरी तरह डाँटा था, सोचकर अमर कर मन दुखी हो गया।
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वह बूढ़े बाँसुरी बाबा के पास चुपचाप लेटा रहा,
फिर न जाने कब नींद आ गई। एकाएक बूढ़े
की आवाज सुनकर उसकी नींद खुल गई। बूढ़ा चीख रहा था-“चोर...चोर.... दौड़ो-दौड़ो।”
अमर झटके से उठा। धुँधलके में उसने कई
लोगों को खड़े देखा। दो आदमी
बाँसुरी बाबा को मार रहे थे.... डर के
मारे अमर की घिग्घी बँध गई।
फिर एकाएक सराय का दरवाजा खुला। दरवाजे
पर रोशनी हो गई। कई आदमी अन्दर से निकले। उन्हें देखकर बूढ़े को पीटते लोग वहाँ से भाग गए।
“कहाँ हैं चोर..... क्या हुआ....अरे, यह तो वही बूढ़ा है।” एक आवाज आई।
अमर ने सरायवाले की आवाज पहचान ली।
बोला-“उन लोगों ने बाबा को मारा है।”
सरायवाला लालटेन लेकर आगे आया। लालटेन
की पीली रोशनी में बाँसुरी बाबा का
खून से सना चेहरा दिखाई दिया। उसके
कपड़े फट गए थे। वह कराह रहा था।
“अरे। बूढ़े को तो बहुत चोट आई है।” सरायवाले ने कहा, फिर साथ खड़े लोगों से बोला-“इसे अन्दर ले चलो,
जल्दी। नहीं तो ज्यादा खून निकलने से मर जाएगा।”
कई आदमियों ने बाँसुरी बाबा को उठा लिया
और सराय के अन्दर ले चले। तभी अमर को कुछ ख्याल आ गया। उसने झुककर बूढ़े
की पोटली उठा ली और उन लोगों के पीछे-पीछे सराय में चला गया।
सराय के आँगन में खूब रोशनी थी। एक
तरफ कई आदमी खड़े थे-उनके पीछे औरतें भी थीं। बाँसुरी बाबा को एक चारपाई पर
लिटा दिया गया। अमर उसके पास जा बैठा। वहाँ खड़े लोग आपस में बातें कर रहे
थे-“कौन था, डाकू थे। बूढ़े को मार रहे थे....”
एक आदमी रुई और दवा लेकर आया। उसने
बाँसुरी बाबा के बदन पर लगा खून पोंछा
फिर दवा लगा दी। वह वैद्य था, सराय का नौकर उसे पास
की बस्ती से बुलाकर लाया था। वैद्य कुछ देर बूढ़े की नाड़ी देखता रहा। कोई दवा
पिलाई, फिर उठकर
सरायवाले के पास आया। धीरे से बोला-“इसे काफी चोट लगी है।
बुखार भी है। मैंने दवा दे दी है। काफी ध्यान रखना पड़ेगा। यह कौन है?’’
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अमर दोनों की बातें सुन
रहा था। सरायवाला बोला-“पता नहीं कौन है,
शायद भीख माँगता फिरता है। साथ
में वह लड़का है।” और उसने अमर की तरफ इशारा किया।
वैद्य ने अमर को अपने पास बुलाया। कहा-“बच्चे, यह बूढ़ा तेरा कौन है?”
अमर ने सिर झुका लिया, कुछ बोला नहीं। वैद्य
ने दवाई की पुडि़या उसके हाथ
में थमा दी। बोला-“गरम पानी के साथ रात
में थोड़ी-थोड़ी देर बाद देना। सुबह
इन्हें लेकर मेरे दवाखाने पर आ जाना।
मैं देखकर पट्टी बदल दूंगा।” अमर ने
तब भी कुछ नहीं कहा। वै़द्य की बात समझ
में नहीं आ रही थी। बस इतना मालूम
था कि बूढ़े बाँसुरी बाबा को ज्यादा चोट
आई है।
वैद्य चला गया। तभी बूढ़े ने आँखें
खोलीं। धीमे से पुकारा-“छोकरे।”
“बाबा।”
कहता हुआ अमर उसके पास चला गया। बूढ़े
ने अमर का हाथ थाम लिया। मीठे स्वर में बोला-“क्यों, डर गया?”
“नहीं तो।”
अमर ने कहा, लेकिन वह सचमुच डर
गया था।
उसी समय सराय का रसोइया गिलास में गरम
दूध लेकर आया। बोला-“पी लो।”
अमर ने बूढ़े को सहारा देकर बैठा दिया।
बूढ़ा दूध पीने लगा। नौकर से बोला-“इस बच्चे को कुछ दो,
सुबह से भूखा है।”
नौकर गया और एक थाली में दो रोटी और
थोड़ी-सी सब्जी रख लाया। अमर खाने
लगा। बूढ़े को चारपाई पर बैठे देख
सरायवाला तथा दूसरे कई लोग पास में आ
जुटे। सराय वाले ने पूछा, “क्या हुआ बूढ़े बाबा? वे कौन लोग थे।
तुम्हें क्यों मारा उन लोगों ने?”
बाँसुरी बाबा ने बारी-बारी से सबकी ओर देखा, फिर धीमी आवाज में बोला-“मैं बाहर खुले में लेटा था। तभी कुछ लोग आए और एक गाड़ी के पास खड़े होकर धीमे-धीमे बातें करने लगे। वे
बहुत पास थे इसलिए मैं उनकी बातें सुन सकता था। वे आपस में कह रहे थे कि इस
सराय में अभी-अभी एक सेठ अपने परिवार के साथ आया है। उसके पास काफी
रुपया-पैसा है। मैं समझ गया कि वे चोर-डाकू हैं और सराय में घुसकर लूटपाट करना
चाहते हैं।‘’
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”
“ऐसा!”
सराय वाले ने अचरज भरे स्वर में कहा।
बूढा जरा दम लेने के लिए रुका। बाकी लोग
एकदम चुप खड़े उसकी बात सुन रहे थे।
“फिर क्या हुआ?” एक आदमी ने पूछा? वह दो औरतों के पास
खड़ा था। उन सभी ने बहुत बढि़या कपड़े पहन रखे थे। शायद वही सेठ था।
बूढ़े ने आगे कहा, ”मैं उन बदमाशों की
बातें सुनकर डर गया। सोचने लगा कि
अगर ये लोग सराय में घुस गए तो बहुत
गड़बड़ मच जाएगी। बस, मैं एकदम उठा और
‘चोर-चोर दौड़ो-बचाओ’ चिल्लाने लगा। मुझे
उम्मीद थी कि मेरे इस तरह
चिल्लाने से बदमाश हड़बड़ाकर भाग
जाएँगे। लेकिन वे मुझ पर ही टूट पड़े। फिर
मुझे पता नहीं क्या हुआ।” इतना कहकर बूढ़ा चुप
हो गया। वह हाँफ रहा था। फिर खाँसने लगा। अमर ने उठकर बूढ़े की पीठ सहलानी शुरु कर दी।
“हाँ,
बहुत गड़बड़ मच जाती, क्योंकि सराय में सब
सो चुके थे। ऐसे में बदमाश कोई भी शरारत कर सकते थे।” वहाँ खड़े लोगों ने
कहा। सरायवाले ने भी उनकी
हाँ में हाँ मिलाई।
सेठ ने कहा-“बाबा, हम लोग तुम्हारा
अहसान कभी न भूलेंगे। तुमने अपनी जान की
परवाह न करके सराय वालों को सचेत कर
दिया।”
सरायवाला बोला-“चोर-चोर बचाओ, दौड़ो की आवाज सुनकर
मेरी नींद खुल गई थी। मैं दो नौकरों को लेकर सराय से बाहर आया। हमें देखते ही बदमाश भाग
गए।”
अमर सोच रहा था-रात को अगर सरायवाला
हमें अन्दर आने देता तो बाँसुरी बाबा
कभी घायल न होते। फिर मन में आया, ‘अगर बाबा को चोट न
लगती तो न सराय में जगह मिलती, न खाना ही मिलता।
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’
तभी सराय का नौकर आकर बोला-“अपने बाबा को वहाँ ले
आओ, उस कोठरी में, बीमार
आदमी का खुले में लेटना ठीक नहीं है।”
अमर ने बाँसुरी बाबा को सहारा देकर
उठाया और कोठरी में ले गया। वहाँ एक
चारपाई पड़ी थी, उस पर कुछ बिछा हुआ
नहीं था। बाँसुरी बाबा चारपाई पर
गिर-सा पड़ा। सराय के आँगन से कोठरी तक
आने में ही वह हांफने लगा था। शरीर
पर बंधी पट्टियों पर जगह-जगह खून दिखाई
दे रहा था। एक तरफ जलती मोमबत्ती
रखी थी। उसकी लौ काँपती तो दीवार पर
अजीब छाया पड़ने लगती।
बाबा कराह रहा था। देखकर
अमर की आँखों में आँसू आ गए। सोचने लगा-क्या इस हालत में बाँसुरी बाबा
मुझे अपने पिताजी के पास ले जा सकेगा?
कैसे ले जाएगा? यह तो बिना सहारे के चल भी नहीं सकता। तो क्या मैं कभी पिताजी के
पास नहीं जा सकूंगा, तब तो माँ के पास ही लौट जाना चाहिए। लेकिन कैसे? बहुत देर तक इसी तरह के विचार आते रहे उसके मन में।
बीच-बीच में बूढ़ा धीरे-से कहता-“बेटा.... छोकरे..... दौड़ो....दौड़ो... ”उसकी आवाज सुनकर अमर
डर जाता, उठकर कोठरी के दरवाजे पर जा खड़ा होता। सराय के आँगन में अब
अँधेरा छा चुका था... सब लोग अपने-अपने कमरों में सोने चले गए थे। अमर
ने सराय के दरवाजे की ओर देखा-बड़ा दरवाजा अन्दर से बन्द था। ‘अब डाकू अन्दर नहीं आ सकेंगे।’ अमर ने सोचा। दिमाग में रह-रहकर एक ही बात आ रही थी-“अगर सराय वालों ने हमें पहले अन्दर आने दिया होता तो यह सब क्यों होता।”
कुछ देर तक अमर कोठरी के दरवाजे पर खड़ा
रहा। फिर अन्दर जाकर चारपाई के पास लेट गया। बूढ़ा बाँसुरी बाबा सो रहा था।
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6.
मेरा बाँसुरी वाला
कहीं कौए की काँव-काँव से अमर की नींद टूट गई। वह झटके से उठा।
चारपाई पर बाँसुरी बाबा लेटा था। बाहर सराय के आँगन में हलचल थी। उसी समय
रातवाला सेठ कोठरी के दरवाजे पर आ खड़ा हुआ। उससे आँखें मिलते ही अमर के
होंठों से निकला-“आप बूंदपुर जा रहे हैं?”
सेठ ने
अचरज से अमर की ओर देखा, “बूंदपुर....क्यों.... वहाँ किसलिए? कौन है वहाँ। कहाँ है बूंदपुर....” अमर चुप रहा, सेठ को पता ही नहीं था कि अमर का घर कहाँ है।
अगर पता होता तो वह उनके साथ चला जाता।
“बाबा,
ओ बाबा,
कैसे हो?” सेठ ने पुकारा।
बाँसुरी बाबा ने आँखें खोली. और बाहर की तरफ देखा। वह बड़े जोर से कराह
उठा। उठकर बैठने की कोशिश करता रहा। अमर ने उसे सहारा देकर बैठा दिया। सेठ
बोला-“हम लोग जा रहे हैं बाबा। अगर रात को तुम न होते तो न जाने हम लोगों के साथ क्या होता।”
”मैंने कुछ नहीं किया, मैं तो....” और बाँसुरी बाबा फिर
कराह उठा।
“बाबा,
मैं वैद्य जी से कहता जाऊंगा। वह आकर तुम्हारी मरहम-पट्टी कर जाएँगे।” सेठ ने कहा। तभी सेठ
के पीछे खड़ी औरत ने एक टोकरी कोठरी के अन्दर रख दी। कोठरी में
भोजन और फलों की खुशबू भर गई। सेठ ने कहा-“बाबा, यह सब तुम्हारे और बच्चे के लिए है। रख लो मना मत करना।”
इसके बाद सेठ तथा उसके परिवार के लोग
सराय से बाहर चले गए। अमर सराय के दरवाजे पर जा खड़ा हुआ। गाड़ी में
सामान रखा गया, वे सब बैठे फिर गाड़ी धूल उड़ाती हुई चली गई।
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अमर बहुत देर तक सराय के
दरवाजे पर खड़ा-खड़ा उस ओर देखता रहा जिधर सेठ की गाड़ी गई थी, फिर बाँसुरी बाबा की
पुकार सुनकर अन्दर चला गया।
बूढ़ा टोकरी में से फल लेकर खा रहा था।
उसने कहा-“छोकरे, खा ले, पेट भर ले, फिर पता नहीं कब तक न मिले।”
वे लोग खा रहे थे, तभी वैद्य आ गया।
उसने बूढ़े के घाव देखे, साफ करके
पट्टियाँ बाँध दीं, फिर बोला-“आज मैं सेठ के कहने
से आ गया हूँ। मैं कहीं आता-जाता नहीं। इलाज करवाना है तो मेरे दवाखाने पर आ
जाना...समझे। और पैसा टका लेकर आना....सेठ ने सिर्फ आज भर के लिए पैसे दिए थे
मुझे....समझे....” और फिर तेजी से बाहर चला गया। बाँसुरी बाबा बिना कुछ बोले बाहर
की तरफ देखता रहा, फिर अमर ने देखा बूढ़े का बदन काँप रहा है। उसके चेहरे पर गुस्सा था।
“बाबा,
आप मुझे पिताजी के पास कब ले चलेंगे? अब तो बहुत दिन हो गए
हैं।‘’
बूढ़े ने घूरकर अमर की ओर देखा, चिल्लाकर बोला-“छोकरे, यह क्या रट लगा रखी है। देखता नहीं मुझे कितनी चोट आई है। अपनी ही बात कहे जाता
है। अगर बार-बार कहेगा तो मैं नहीं ले जाऊँगा। यहीं छोड़कर चल दूँगा।
फिर तू कहीं भी नहीं जा सकेगा। जैसा कहता हूँ, वैसा कर....”
बूढ़े की चिल्लाहट सुनकर अमर
सहम गया, फिर उसने कुछ न कहा। अपनी नन्ही बाँसुरी हाथ में लेकर सराय से बाहर चला गया-वहाँ कई गाडि़यों खड़ी थीं। एक
तरफ पेड़ के नीचे बैठे कुछ लोग बातें कर रहे थे। हवा में ठंडक थी, आकाश में गहरे काले बादल तेजी से दौड़े जा रहे थे। अमर ने बाँसुरी होठों से
लगाई और एक पेड़ के नीचे जा बैठा। एक मीठी आवाज हवा में उभरने लगी। उसकी
आँखें मुँद गईं। वह वहाँ बाँसुरी बजाता रहा। उसे पता न चला कि पेड़ के
नीचे बैठे लोग उठकर सामने आ खड़े हुए हैं। कई लोगों ने उसके सामने सिक्के
उछाल दिए। सबके चेहरे पर प्रशंसा का भाव था। धीरे-धीरे और लोग भी आ गए।
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बूढ़ा बाँसुरी बाबा भी
अन्दर से निकल आया और लड़खड़ाता -लंगड़ाता हुआ अमर के पास आ खड़ा हुआ। खड़ा-खड़ा
सिर हिलाने लगा, फिर धीरे-से अमर की कमर थपथपा दी। अमर ने बाँसुरी बजानी
बन्द कर दी। बाँसुरी की आवाज बन्द होते ही भीड़ में खड़े लोग तालियाँ
बजाने लगे। कई सिक्के वहाँ धूल में आकर गिरे,
जहाँ अमर बैठा हुआ था।
लेकिन अमर वहाँ रुका नहीं, न ही उसने जमीन पर
पड़े सिक्कों की ओर देखा। बाँसुरी हाथ में लिए दौड़ता हुआ सराय में
चला गया-कोठरी में घुसकर बैठ गया। न जाने क्यों उसे रोना आ रहा था।
आँसू थे कि रुकने का नाम ही नहीं ले रहे थे,
बहते जा रहे थे।
बाहर बाँसुरी बाबा जमीन पर पड़े
चमकते सिक्कों की ओर देख रहा था। बाँसुरी सुनने के लिए जमा हए लोग बिखरने
लगे थे। बाँसुरी बाबा ने एक-एक करके सिक्के उठाने शुरु कर दिए। तभी एक आदमी
ने टोका-“ऐ बूढ़े, यह क्या करता है?
पैसे क्यों उठा रहा है? वह बच्चा कहाँ गया? ये पैसे उसके लिए
हैं।” बाँसुरी बाबा ने हँसकर
कहा-“हाँ, वह छोकरा अपना ही है। मैं बाबा हूँ उसका।” और सारे सिक्के उठाकर सराय में चला गया।
7.
झूठ का सच
दिन ऐसे ही बीत गया। सारा समय बादल छाए रहे। शाम ढली तो बारिश शुरु
हो गई थी। अँधेरा बढ़ने के साथ-साथ बारिश भी तेज होती गई। उसी बारिश में
कुछ मुसाफिर सराय में आए। थोड़ी देर बाद सरायवाला कोठरी में आया। उसने कहा-“बाबा, तुम लोगों को कोठरी खाली करनी होगी। कुछ मुसाफिर अभी-अभी आए हैं।
सराय में कमरे खाली नहीं हैं।”
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“लेकिन...”
बूढ़ा कहने लगा।
सरायवाला बोला-“मैं जानता हूँ तुम्हारी तबीयत खराब है,
लेकिन हमें भी तो सराय को चलाना है।
आखिर हम किराया देकर ठहरने वाले मुसाफिरों को तो वापस जाने के लिए नहीं कह
सकते।”
बूढ़े ने इसके बाद कुछ नहीं कहा, अपनी पोटली उठाकर
कोठरी से बाहर आ गया। अमर ने सेठ की दी हुई टोकरी उठा रखी थी। उसमें अब भी कुछ
फल बचे हुए थे। बाहर आते ही पानी की तेज बौछार ने दोनो को भिगो दिया।
सरायवाले ने कहा-“बाबा, तुम दोनों सराय के दरवाजे पास सो जाना। वहाँ चारपाई
वगैरह तो नहीं है, पर ऊपर छत है, इसलिए बारिश से बच
जाओगे।”
बाँसुरी बाबा ने सराय के बड़े दरवाजे के
पास जमीन पर पोटली रख दी और लेट गया। जमीन ठंडी थी। हवा का झोंका आता तो
पानी की बौछार दोनों को भिगो देती। बाँसुरी बाबा का शरीर काँपने लगा। उसे
सर्दी लग रही थी। अमर ने हाथ छूकर देखा,
बूढ़े का बदन खूब गरम था।
“बाबा,
तुम्हें तो तेज बुखार है।” अमर बोला।
बाँसुरी बाबा के होंठों पर हँसी दिखाई
दी। बोला-“हाँ है तो सही,
पर क्या किया जाए।” और उसने आँखें बन्द
कर लीं।
अमर आँगन में देखता रहा। खूब तेजी से
पानी पड़ रहा था। धीरे-धीरे कमरों
में जलती रोशनियाँ बुझने लगीं। कुछ देर
बाद सब तरफ अँधेरा छा गया। बस, दरवाजे के पास लटकी एक लालटेन जलती रह गई। उसकी चिमनी पर कालिख
जमी थी-इसलिए रोशनी बहुत हल्की थी। एक कीड़ा तेजी से लालटेन के
चारों ओर मँडरा रहा था। रह-रहकर वह शीशे से टकराता। चट् की हल्की आवाज होती।
एकाएक कानों में आवाज चुभी-“छोकरे! सो गया क्या?”
अब अमर को पता चला कि वह सचमुच सो गया
था, न जाने कब नींद आ गई थी। दरवाजे के पास लटकती लालटेन लगभग बुझ
चुकी थी। ( आगे और है )
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